मुखर्जी के बलिदान दिवस को ‘उपाध्याय दिवस’ बना बैठा भाजपा संगठन!

प्रेस नोट की चूक से मची किरकिरी, जिलाध्यक्ष की कार्यशैली और मीडिया प्रबंधन पर उठे गंभीर सवाल!

झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
भारतीय जनता पार्टी अपने वैचारिक पुरोधाओं और महानायकों के सम्मान की बात करती है, लेकिन झुंझुनूं भाजपा संगठन से सामने आई एक बड़ी चूक ने संगठन की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी के संस्थापक विचारकों में शामिल डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम का प्रेस नोट कथित रूप से इस प्रकार जारी हुआ कि उसमें बलिदान दिवस को पंडित दीनदयाल उपाध्याय से जोड़ दिया गया। इस घटना के बाद राजनीतिक और संगठनात्मक हलकों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। राजस्थान भाजपा द्वारा पूरे प्रदेश में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर संगोष्ठियों और विचार कार्यक्रमों के आयोजन के निर्देश दिए गए थे। इसके लिए जिला स्तर पर संयोजक और सह-संयोजकों की नियुक्तियां भी की गई थीं। झुंझुनूं जिला मुख्यालय पर भी प्रदेश महामंत्री की मौजूदगी में कार्यक्रम आयोजित हुआ, लेकिन कार्यक्रम के बाद जारी प्रेस नोट में कथित रूप से हुई तथ्यात्मक त्रुटि ने पूरे आयोजन की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया। सूत्रों के अनुसार, समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों में कार्यक्रम को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस के बजाय पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संदर्भ में प्रस्तुत कर दिया गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा जैसे वैचारिक संगठन के लिए अपने प्रमुख नेताओं और उनके ऐतिहासिक योगदान को लेकर इस प्रकार की गलती सामान्य प्रशासनिक भूल नहीं मानी जा सकती।

मीडिया प्रबंधन पर भी उठे सवाल

भाजपा संगठन में अधिकृत जिला मीडिया प्रभारी नियुक्त होने के बावजूद प्रेस नोट किस स्तर से और किसके माध्यम से जारी हुआ, यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है। संगठन के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि यदि मीडिया संबंधी जिम्मेदारियां निर्धारित हैं तो फिर अधिकृत व्यवस्था को दरकिनार कर अन्य माध्यमों से समाचार सामग्री भेजने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि संगठनात्मक प्रक्रियाओं की अनदेखी से न केवल भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है बल्कि इससे अधिकृत पदाधिकारियों की भूमिका भी प्रभावित हो रही है। हालांकि इस संबंध में संगठन की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।भाजपा के कुछ कार्यकर्ताओं का मानना है कि हाल के समय में जिला संगठन में संवाद और समन्वय की कमी दिखाई दे रही है। कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी है कि कई निर्णयों और नियुक्तियों को लेकर असंतोष का वातावरण बना हुआ है। शहर मंडल अध्यक्ष पद से जुड़े मामलों को लेकर भी संगठन के भीतर अलग-अलग स्तर पर चर्चाएं चल रही हैं, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। महानायकों के नाम पर औपचारिकता का आरोप राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यदि किसी कार्यक्रम का उद्देश्य कार्यकर्ताओं को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों और बलिदान से परिचित कराना था, तो कार्यक्रम से जुड़े आधिकारिक दस्तावेजों और प्रेस सामग्री में तथ्यात्मक शुद्धता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए थी। ऐसी त्रुटियां संगठन की वैचारिक प्रतिबद्धता पर अनावश्यक बहस को जन्म देती हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 23 जून 1953 को जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर संघर्ष करते हुए अपना बलिदान दिया था और उन्हें भारतीय जनसंघ के संस्थापक के रूप में याद किया जाता है। वहीं पंडित दीनदयाल उपाध्याय भी भाजपा की वैचारिक विरासत के प्रमुख स्तंभ हैं। ऐसे में दोनों महानायकों के संदर्भों में भ्रम की स्थिति बनना राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों दृष्टि से असहज माना जा रहा है।

अब निगाहें प्रदेश नेतृत्व पर

इस पूरे घटनाक्रम के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं और राजनीतिक हलकों की नजरें प्रदेश नेतृत्व पर टिकी हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस चूक को महज तकनीकी गलती मानकर छोड़ दिया जाएगा या फिर इसकी जिम्मेदारी तय की जाएगी। साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि संगठन में अधिकृत मीडिया व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों पर कोई स्पष्ट रुख सामने आता है या नहीं।फिलहाल, एक प्रेस नोट की कथित चूक ने झुंझुनूं भाजपा संगठन को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है और पार्टी के भीतर संगठनात्मक अनुशासन, समन्वय तथा वैचारिक गंभीरता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।