प्री-क्लोजर के नाम पर वसूले 14,978 रूपये लौटाने के आदेश, उपभोक्ता को 55 हजार मुआवजा; बैंक पर 25 हजार की विशेष शास्ति
झुंझुनूं ।अजीत जांगिड़
बैंकिंग नियमों की अवहेलना कर ऋण खाते के प्री-क्लोजर पर अतिरिक्त राशि वसूलना भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को भारी पड़ गया। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, झुंझुनूं ने एक अहम फैसले में एसबीआई, सीकर द्वारा उपभोक्ता से वसूले गए 14,978 रूपये के प्री-क्लोजर चार्ज को अवैध करार देते हुए उसे ब्याज सहित लौटाने के आदेश दिए हैं। आयोग ने बैंक की कार्यप्रणाली को उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए 55 हजार रुपये मुआवजा, 7,500 रुपये वाद व्यय तथा 25 हजार रूपये की विशेष शास्ति भी लगाई है। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेंद्र कुमार सैनी ने यह निर्णय नवलगढ़ निवासी सुभाषचंद्र द्वारा दायर परिवाद पर सुनाया।
13,345 रूपये के बजाय वसूले 28,323 रुपये
परिवाद के अनुसार सुभाषचंद्र ने एसबीआई, सीकर से लिए गए ऋण का शेष बकाया जमा कर ऋण खाता बंद कराने के लिए बैंक से संपर्क किया। बैंक प्रबंधन ने उसे बताया कि खाते में 28,323 रुपये बकाया हैं। इसके बाद उक्त राशि उसके बचत खाते से काटकर ऋण खाता बंद कर दिया गया। बाद में खाते का विवरण देखने पर सामने आया कि वास्तविक बकाया राशि मात्र 13,345 रूपये थी, जबकि शेष 14,978 रूपये प्री-क्लोजर अथवा प्री-पेमेंट पेनल्टी के नाम पर वसूल लिए गए। उपभोक्ता ने कई बार बैंक अधिकारियों से शिकायत कर राशि लौटाने की मांग की, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। आखिरकार उसे न्याय के लिए जिला उपभोक्ता आयोग की शरण लेनी पड़ी।
आरबीआई की गाइडलाइन की खुली अवहेलना
सुनवाई के दौरान बैंक ने ऋण अनुबंध की शर्तों का हवाला देते हुए प्री-पेमेंट चार्ज वसूले जाने को उचित बताया। लेकिन आयोग ने पाया कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के स्पष्ट निर्देश हैं कि व्यक्तिगत ऋणों के फोरक्लोजर अथवा समयपूर्व भुगतान पर बैंक किसी प्रकार का अतिरिक्त प्री-क्लोजर शुल्क नहीं वसूल सकते। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि बैंक ने आरबीआई की गाइडलाइन की अनदेखी करते हुए उपभोक्ता से अवैध वसूली की तथा शिकायत के बाद भी उसका समाधान नहीं किया। यह सेवा में कमी, अनुचित व्यापार व्यवहार और उपभोक्ता अधिकारों के हनन का स्पष्ट मामला है।
ब्याज सहित राशि लौटाने के निर्देश
आयोग ने एसबीआई को आदेश दिया कि वह प्री-क्लोजर चार्ज के रूप में वसूले गए 14,978 रुपये परिवादी को 3 मार्च 2025 से भुगतान की तिथि तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाए। इसके अतिरिक्त मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़ना के लिए 55,000 रूपये तथा वाद व्यय के रूप में 7,500 रुपये का भुगतान भी करे।मामले की गंभीरता को देखते हुए आयोग ने बैंक पर 25,000 रूपये की विशेष शास्ति भी लगाई है। यह राशि राजस्थान राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा कराई जाएगी। आयोग ने यह भी कहा कि बैंक प्रबंधन चाहे तो उपभोक्ता को हुई क्षति और शास्ति की राशि के लिए जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों से इसकी वसूली कर सकता है।
उपभोक्ताओं के लिए नजीर बना फैसला
उपभोक्ता आयोग का यह फैसला बैंकिंग क्षेत्र के लिए स्पष्ट संदेश है कि आरबीआई के नियमों की अनदेखी और उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह निर्णय उन उपभोक्ताओं के लिए भी राहत और प्रेरणा का विषय है, जो बैंकिंग सेवाओं में अनुचित वसूली का सामना कर रहे हैं।











