समीक्षा बैठक या ‘सीक्रेट मिशन’? मीडिया को दूर रख प्रशासन ने खड़े किए बड़े सवाल

प्रभारी सचिव की बैठक पर पर्दा क्यों? म्यूट वीडियो, गायब सूचना और बंद दरवाजों की ‘चुप्पी’ ने बढ़ाई चर्चाएं! झुंझुनूं में अफसरशाही की कार्यशैली पर उठते सवालों के बीच मीडिया से दूरी ने पैदा किए संदेह, पीआरओ और जिला प्रशासन की भूमिका चर्चा में !

झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
जिले में पारदर्शिता और जवाबदेही की बातें करने वाला प्रशासन अब खुद सवालों के घेरे में दिखाई देने लगा है। गुरूवार को कलेक्ट्रेट सभागार में जिले के प्रभारी सचिव एवं सामान्य प्रशासन, मंत्रीमण्डल, सम्पदा, स्टेट मोटर गैरेज एवं नागरिक उड्डयन विभाग के प्रमुख शासन सचिव नवीन जैन ने जिला स्तरीय अधिकारियों के साथ राज्य सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं, मुख्यमंत्री बजट घोषणाओं, राजस्थान सम्पर्क पोर्टल और विभिन्न परियोजनाओं की समीक्षा बैठक ली, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि पूरी बैठक को मीडिया से लगभग “अलग-थलग” रखा गया।
सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा हो रहा है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिनके चलते जिला प्रशासन ने मीडिया को इस महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक की आधिकारिक सूचना तक देना जरूरी नहीं समझा? आमतौर पर जिला प्रशासन की महत्वपूर्ण बैठकों की सूचना पीआरओ कार्यालय के अधिकृत मीडिया ग्रुप में साझा की जाती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इससे पत्रकारों में नाराजगी के साथ-साथ कई तरह की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।
मामला यहीं तक सीमित नहीं रहा। बैठक के बाद पीआरओ कार्यालय की ओर से जो विजुअल और वीडियो जारी किए गए, उनमें कुछ विडियो के ऑडियो को म्यूट कर दिया गया। अब यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर बैठक की आवाज जनता और मीडिया तक पहुंचने से क्यों रोकी गई? यदि बैठक सामान्य प्रशासनिक समीक्षा थी, तो फिर संवाद और पारदर्शिता से परहेज क्यों?
जिले में पिछले कुछ समय से विभिन्न विभागों की कार्यशैली, योजनाओं की धीमी प्रगति और प्रशासनिक समन्वय को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में प्रभारी सचिव की समीक्षा बैठक को मीडिया से दूर रखना प्रशासनिक मंशा पर भी सवाल खड़े कर रहा है। पत्रकारों के बीच यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि कहीं अधिकारियों की कार्यशैली पर उठ रहे सवालों और संभावित फटकार को सार्वजनिक होने से बचाने का प्रयास तो नहीं किया गया?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि जनता और प्रशासन के बीच पारदर्शिता की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माना जाता है। ऐसे में मीडिया को दूर रखना और आधिकारिक सूचना तक साझा नहीं करना प्रशासनिक संवेदनशीलता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। इससे यह संदेश भी जाता है कि कहीं न कहीं जिला प्रशासन आलोचनात्मक सवालों और सार्वजनिक जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रहा है। हालांकि प्रशासन की ओर से इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है, लेकिन जिस तरह से बैठक को सीमित दायरे में रखा गया और सूचना प्रवाह को नियंत्रित किया गया, उसने कई नई बहसों को जन्म दे दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि जिला प्रशासन और पीआरओ कार्यालय इस मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हैं या फिर यह “मौन” आगे भी सवालों को और गहरा करता रहेगा।