प्रकृति के छंदों का गीत है बरखा…..

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चूरू। लोक संस्कृति शोध संस्थान नगर श्री में रविवार शाम को साहित्य गोष्ठी का आयोजन हुआ। सचिव श्यामसुन्दर शर्मा ने बताया कि हर महीने के अंतिम रविवार को होने वाली पं. कुंज विहारी शर्मा स्मृति साहित्य गोष्ठी का आयोजन प्रो. डॉ. सरोज हारित की अध्यक्षता व डॉ. सुरेन्द्र शर्मा के विशिष्ट आतिथ्य में हुआ। सृजन से साक्षात्कार कार्यक्रम में प्रो. हिमांशु सेंगर महला ने अपने आत्मकथ्य में कहा कि वे प्रकृति व आध्यात्मक के प्रति ज्यादा आकर्षित रही हैं। अपनी रचनाओं के पठ़न-शिव को अर्पित कविता से किया। आकर होले से तू दे दे थपकी…. दूर प्रतीति ढ़लता दिनकर… बूझती नित नित नव दर्पण…., लक्ष्य भेदन अनुरक्त हो….. कविताओं की गांभीर्यता युक्त अभिव्यक्ति पर श्रोताओं ने खूब दाद दी। प्रकृति विमर्श की रचनाओं- रूत वसन्त जो बदले… नीर भरी दो बदलियां… छमछम पायल छमकती होले-होले उतरी सांझ… बारिसे से कब बीत पाती है थम जाने के बाद…, प्रकृति छन्दों का गीत है बरखा…., धानी चुनरिया ओढ़ खिलखिला रही धरा…. ने अपना खूब प्रभाव छोड़ा, श्रोताओं ने खूब सराहा। इनके अतिरिक्त आध्यात्मिक भावों से परिपूर्ण रचना- मन में पुनः विराट लहराया…, जब गीत कोई गाता है…, नारी को समर्पित कविता-अपनी काया स्वयं धरो… को खूब प्र्रसंशा मिली। चर्चा सत्र में प्रो. डॉ. सुरेन्द्र डी. सोनी व प्रो. डॉ. के.सी. सोनी ने कवयित्री महला के रचना संसार पर अपने समीक्षात्मक विचार प्रकट करते हुए कहा कि इन्होंने अपनी कविताओं में हिन्दी भाषा के मूल स्वरूप का बहुत ही सांगोपांग प्रयोग किया है। विशिष्ट अतिथि डॉ. सुरेन्द्र शर्मा ने कविता ताकती है मुझे… के माध्यम से अपने भाव प्रकट किये। प्रो. डॉ. सरोज हारित ने कविताओं व्यक्त प्रकृति विमर्श पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम के अंत में नगर श्री परिवार की ओर से साहित्यकार प्रो. हिमांशु महला को शॉल ओढ़ाकर व प्रतीक चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया। कुशल संचालन प्रो. कमलसिंह कोठारी ने किया।

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