झुंझुनूं जिला उपभोक्ता आयोग का अहम फैसला : 9 प्रतिशत ब्याज के साथ 1.35 लाख मानसिक संताप और 10,500 रूपए परिवाद व्यय भी देने के आदेश
झुंझुनूं। अजीत जांगिड़
बीमा क्लेम के निस्तारण में लंबी टालमटोल करना यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को भारी पड़ गया। सर्वेयर की रिपोर्ट मिलने के बावजूद करीब 572 दिन तक बीमा क्लेम का अंतिम निस्तारण नहीं करने को जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, झुंझुनूं ने गंभीर सेवा दोष एवं अनुचित व्यापार-प्रथा माना है। आयोग ने बीमा कंपनी को बीमित वाहन की राशि 4 लाख 80 हजार रूपए, इस राशि पर 29 जनवरी 2025 से वास्तविक भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, मानसिक संताप के लिए 1 लाख 35 हजार रूपए तथा परिवाद व्यय के रूप में 10,500 रुपए अदा करने के आदेश दिए हैं। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के अध्यक्ष एवं पीठासीन अधिकारी मनोज कुमार मील तथा सदस्य प्रमेन्द्र कुमार सैनी ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी के बचाव में प्रस्तुत तर्कों को खारिज कर दिया। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग तथा राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग द्वारा प्रतिपादित विधिक सिद्धांतों को भी अपने निर्णय में महत्वपूर्ण आधार बनाया।
सर्वेयर रिपोर्ट के बाद 30 दिन में निर्णय जरूरी, फिर भी चलता रहा इंतजार
मामला बोलेरो वाहन चोरी से जुड़ा है। वाहन की बीमा पॉलिसी 28 नवंबर 2023 से 27 नवंबर 2024 तक प्रभावी थी। 23 नवंबर 2024 की रात करीब 11.45 बजे वाहन चोरी हो गया। घटना की रिपोर्ट अगले ही दिन 24 नवंबर 2024 को खेतड़ी नगर थाने में दर्ज कराई गई। परिवादी ने बीमा कंपनी को घटना की सूचना देने के बाद 26 नवंबर 2024 को क्लेम आवेदन प्रस्तुत किया। पुलिस अनुसंधान में वाहन चोरी होना प्रमाणित हुआ। पुलिस की अंतिम जांच रिपोर्ट को न्यायिक मजिस्ट्रेट, खेतड़ी ने 16 जनवरी 2025 को स्वीकार कर लिया। इसके बाद बीमा कंपनी के सर्वेयर ने 29 जनवरी 2025 को अपनी रिपोर्ट बीमा कंपनी को सौंप दी। रिपोर्ट के साथ एफआईआर की प्रमाणित प्रति तथा न्यायालय द्वारा पुलिस की अंतिम रिपोर्ट स्वीकार किए जाने का आदेश भी उपलब्ध था। इसके बावजूद बीमा कंपनी ने क्लेम पर अंतिम निर्णय लेने में असाधारण देरी की। आयोग ने इस देरी को गंभीरता से लेते हुए कहा कि सर्वेयर की रिपोर्ट उपलब्ध होने के बाद क्लेम को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता। आयोग ने सर्वेयर रिपोर्ट की तारीख से निर्णय तक 572 दिन की देरी को विधिक त्रुटि और गंभीर सेवा दोष माना । बीमा कंपनी की ओर से एफआईआर में कथित देरी, बीमा कंपनी को सूचना देने में विलंब और दस्तावेजों की उपलब्धता को लेकर आपत्तियां उठाई गईं। हालांकि आयोग ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। आयोग ने रिकॉर्ड के आधार पर माना कि चोरी की घटना 23 नवंबर की रात मध्यरात्रि के आसपास हुई और एफआईआर 24 नवंबर को ही दर्ज कराई गई थी। ऐसे में बीमा कंपनी द्वारा सूचना अथवा एफआईआर में मामूली अंतर को आधार बनाकर क्लेम को लंबित रखने का तर्क स्वीकार्य नहीं था। आयोग के समक्ष यह भी स्पष्ट था कि बीमा कंपनी के पास एफआईआर, न्यायालय का आदेश और सर्वेयर की रिपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध थे। इसके बावजूद क्लेम का समयबद्ध निस्तारण नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय आयोग के फैसलों का हवाला
आयोग ने अपने निर्णय में यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस बनाम एमकेजे कॉर्पोरेशन सहित सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायिक दृष्टांतों का उल्लेख किया। निर्णय में बीमा कंपनियों के लिए बीमा दावों के निस्तारण में सद्भावना, निष्पक्षता और समयबद्धता के महत्व को रेखांकित किया गया।आयोग ने यह स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी का दायित्व केवल प्रीमियम प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। वैध बीमा दावा प्रस्तुत होने पर उसका निष्पक्ष और समयबद्ध निस्तारण करना भी बीमा कंपनी की जिम्मेदारी है। सर्वेयर की रिपोर्ट उपलब्ध होने के बाद भी लंबे समय तक क्लेम को लंबित रखना उपभोक्ता के प्रति सेवा में कमी की श्रेणी में आता है। निर्णय में राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग के उस दृष्टिकोण का भी संदर्भ लिया गया, जिसमें सर्वेयर की रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद अनावश्यक देरी की स्थिति में उपभोक्ता को ब्याज से वंचित नहीं किए जाने की बात कही गई है। संबंधित निर्णय के विरुद्ध अपील को राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग द्वारा खारिज किए जाने का भी उल्लेख किया गया। इसी विधिक दृष्टिकोण के आधार पर झुंझुनूं जिला उपभोक्ता आयोग ने 29 जनवरी 2025, यानी जिस दिन सर्वेयर की रिपोर्ट बीमा कंपनी को प्राप्त हुई, उसी दिन से बीमित राशि पर ब्याज देने का आदेश दिया। आयोग ने बीमा कंपनी को 4.80 लाख रूपए की बीमित राशि 45 दिन के भीतर अदा करने के निर्देश दिए हैं। इस राशि पर 29 जनवरी 2025 से वास्तविक भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। इसके अतिरिक्त उपभोक्ता को हुई मानसिक पीड़ा एवं उत्पीड़न के लिए 1.35 लाख रूपए तथा परिवाद व्यय के रूप में 10,500 रूपए अलग से अदा करने होंगे। आदेश की निर्धारित अवधि में पालना नहीं होने पर आदेश में निर्धारित प्रावधान के अनुसार 12.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा। जिला उपभोक्ता आयोग का यह फैसला बीमा क्लेम के मामलों में महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है। निर्णय से स्पष्ट संदेश गया है कि सर्वेयर की रिपोर्ट मिलने के बाद बीमा कंपनी क्लेम को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकती। यदि वैध दावे पर समयबद्ध निर्णय नहीं लिया जाता है तो देरी के लिए बीमा कंपनी को ब्याज के साथ मानसिक संताप और परिवाद व्यय जैसी राहत भी देनी पड़ सकती है।












