गुरू-शिष्य परंपरा का पुनर्स्थापन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता : प्रो. सुरेंद्र डी. सोनी

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मोरारका राजकीय महाविद्यालय में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ का ‘गुरू वंदन’ कार्यक्रम, भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों पर हुआ चिंतन

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झुंझुनूं।अजीत जांगिड़
अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (उच्च शिक्षा) की स्थानीय इकाई, श्री राधेश्याम आर. मोरारका राजकीय महाविद्यालय, झुंझुनूं के तत्वावधान में शुक्रवार को ‘गुरू वंदन’ कार्यक्रम का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय गुरू-शिष्य परंपरा, वेद आधारित शिक्षा व्यवस्था तथा राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूमिका पर विस्तृत मंथन हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य एवं स्थानीय इकाई अध्यक्ष प्रो. सुरेंद्र सिंह ने की, जबकि प्रदेश प्रमुख (सेवा आयाम) प्रो. सुरेंद्र डी.Doctors become blood donors to save the lives of high-risk pregnant women. मुख्य अतिथि रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती एवं महर्षि वेदव्यास के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। महाविद्यालय इकाई सचिव प्रो. मान सिंह मान ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की। मुख्य अतिथि प्रो. सुरेंद्र डी. सोनी ने कहा कि भारतीय गुरू-शिष्य परंपरा केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र के चरित्र निर्माण की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि गुरुकुल शिक्षा पद्धति विद्यार्थियों में राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिक मूल्यों और संस्कारों का विकास करती थी, जिसे वर्तमान समय में पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में विलियम जोन्स, जेम्स मिल और मैकाले जैसे ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा भारतीय वेदों, उपनिषदों और इतिहास की ऐसी व्याख्याएं प्रस्तुत की गईं, जिनमें अनेक भ्रामक तथ्यों का समावेश था। इससे भारतीय इतिहास और संस्कृति को गहरा नुकसान पहुंचा। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी के समक्ष भारतीय दृष्टिकोण से निष्पक्ष, प्रमाणिक और तथ्यपरक इतिहास प्रस्तुत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। मुख्य वक्ता प्रो. हरिराम आलड़िया ने गुरू तत्व की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महर्षि वेदव्यास भारतीय ज्ञान परंपरा के महान पुरोधा हैं। उन्होंने संभूति-असंभूति, स्वाध्याय, चिंतन, लेखन, विद्या और अविद्या जैसे विषयों पर अपने चिंतन से समाज को नई दिशा प्रदान की। उन्होंने कहा कि गुरू वंदन कार्यक्रम भारतीय संस्कृति में गुरू के सर्वोच्च स्थान का प्रतीक है। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेंद्र सिंह ने कहा कि गुरू और शिष्य का संबंध केवल शिक्षा तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह आजीवन चलने वाला प्रेरणादायी संबंध है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक शिक्षक का दायित्व है कि वह अपने आचरण, व्यक्तित्व और कार्यशैली से विद्यार्थियों के लिए आदर्श बने। कार्यक्रम का संचालन प्रो. मान सिंह मान ने किया। अंत में एबीआरएसएम जिला सचिव डॉ. विकास भड़िया ने सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ. विकास भड़िया (जिला सचिव), डॉ. शशि प्रकाश अहलावत (जिला उपाध्यक्ष), डॉ. शुभकरण (सह-सचिव) सहित महाविद्यालय के प्राध्यापकगण एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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