उपभोक्ता आयोग अध्यक्ष मनोज मील ख़ुद पोस्टकार्ड लिखते है, पीड़ित पक्षकार उपभोक्ता आयोग की सुनवाई में मौजूद रहने लगे
झुंझुनूं I अजीत जांगिड़
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में लम्बित परिवादों का त्वरित रूप से निस्तारण करने के लिए उपभोक्ता आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील द्वारा पक्षकारों को पोस्टकार्ड लिखने के नवाचार ने तारीख पर तारीख में चलने वाले परिवादों की कड़वी हकीकत से रूबरू करवाया है। लम्बे समय से न्याय की उम्मीद में बैठें पीड़ित पक्षकार अपने परिवाद की सुनवाई पर नजर रखने लगे है। जिसका सुखद व सकारात्मक परिणाम यह निकला है कि वर्षो से सुनवाई में चल रहे प्रकरणों का बड़ी संख्या में निस्तारण होने लगा है। इस अभियान का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि पोस्टकार्ड को ख़ुद उपभोक्ता आयोग अध्यक्ष मनोज मील लिखते है और इसकी जानकारी अति गोपनीय रहती है। पक्षकार को भेजे जाने वाले पोस्टकार्ड में परिवाद की सुनवाई की वास्तविकता के साथ-साथ ही न्याय टेबल पर निस्तारण करवाने के लिए आमंत्रित किया जाता है। उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने पोस्टकार्ड नवाचार के संबंधित चर्चा में बड़ी रोचक जानकारी दी। मील ने बताया कि उनको गोपनीय लिखा हुआ पत्र प्राप्त हुआ। जिसमें लिखा था कि उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष मनोज मील मेरे मानस पुत्रवत हो, मैंने आपको पढ़ाया है। एक पीड़ित को मुकदमे की तारीख नहीं मील रही है। वह मुकदमे का न्याय टेबल पर त्वरित निस्तारण करवाना चाहता है। उसकी न्यायसंगत सुनवाई होने से राहत मिलेगी। परिवादी के नाम व पते से सर्च करवाया गया तो जानकारी मिली की उस परिवादी का प्रकरण कभी उपभोक्ता आयोग में दर्ज ही नहीं हुआ। एक मामले में जानकारी आई की परिवादी को बताया गया कि उसका मामला लोक अदालत सेशन न्यायाधीश के यहाँ चल रहा है और पीठासीन अधिकारी सुनवाई नहीं कर रहे है। उसकी जानकारी करवाने पर अचंभित करने वाला वाक्या हुआ कि उस पीड़ित का प्रकरण उपभोक्ता आयोग में 13 वर्षों से लम्बित है और विभिन्न प्रार्थना पत्र का निस्तारण होने के लिए नियत किया हुआ है। एक पीड़ित उपभोक्ता आयोग में अपने प्रजरण की जानकारी लेने आया। जब उसे अवगत करवाया गया कि आपके नाम का प्रकरण आयोग में दर्ज नहीं हुआ है। तब उस उपभोक्ता ने बताया कि उसका मुकदमा तो फैसले में है। थोड़े समय बाद ही पीड़ित उपभोक्ता के प्रतिनिधि ने कार्यालय कर्मचारी से सम्पर्क करके निवेदन किया कि उनकी रिश्तेदारी का मामला है। इनका परिवाद पेश करना भुल गया। एक बार कोई तारीख बता दीजिये। जिस पर कर्मचारी ने साफ मना कर दिया और कर्मचारी ने मुझे इससे अवगत करवाया। इन सभी घटनाओं ने आत्मिक रूप से झकझोर कर रख दिया कि आजादी के 80 वें वर्ष में भी पीड़ित उपभोक्ता को न्याय के लिए भटकना पड़ रहा है और चिंताजनक यह भी है कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में 3 से 5 महीने में परिवाद का निस्तारण करने का संकल्प विधिक रूप से मौजूद है। इन गंभीर परिस्थितियों में भी पीड़ित को त्वरित न्याय देने के लिए पोस्टकार्ड भेजने का नवाचार किया गया है। जिससे लम्बित परिवादों के निस्तारण में तेजी आई है और उपभोक्ताओं के गुमराह होने पर भी अंकुश लगा है। मील ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रकरणों के समयबद्ध निस्तारण के लिए तय की गई सुचिता को उपभोक्ता आयोग में सकारात्मक रूप से लागू करते हुए पुराने प्रकरणों को प्राथमिकता से निस्तारित करने का संकल्प दोहराया है।













