संसार में रहें पर संसार हमारे भीतर न आए — स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती

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Swaamishreeh avimukteshwaraanandah स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः

धर्म शास्त्रों में संसार की उपमा सागर से दी गई है । जिस प्रकार सागर में जल भरा होता है उसी प्रकार इस संसार सागर में भी दुःख रूपी जल भरा है । मनुष्य को चाहिए कि वह संसार में तो रहे पर संसार को अपने भीतर न आने दे । जिस प्रकार नाव पानी में रहती है पर जब पानी नाव के अन्दर आने लगता है तो उसे तुरन्त दोनो हाथों से उलीच कर बाहर कर दिया जाता है उसी प्रकार जैसे ही हमारे भीतर संसार समाने लगे हमें तत्काल सचेष्ट होकर संसार को बाहर निकाल देना चाहिए । उक्त उद्गार आज श्रीविद्यामठ के सभागार में आयोजित सत्संग के अवसर पर पूज्यपाद अनन्तश्रीविभूषित उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं पश्चिमाम्नाय द्वारका शारदापीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के शिष्य प्रतिनिधि दण्डी स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती जी ने व्यक्त किए ।

उन्होंने कहा कि धन की तीन प्रकार की गति शास्त्रों में वर्णित है । पहला दान, दूसरा भोग और तीसरा नाश । धन-सम्पत्ति जब हमारे पास अधिक एकत्र हो जाए तो उसे भी दोनों हाथों से खुलकर सत्कार्य के लिए दान करना चाहिए । नहीं तो सारा धन भोग में ही चला जाएगा और यदि भोग भी न किया तो नष्ट हो जाएगा । इसके अतिरिक्त धन की और कोई गति नहीं है ।

पूज्य स्वामिश्रीः ने जरत्कारू ऋषि की कथा सुनाते हुए कहा कि वे तपस्या करते हुए जीवन व्यतीत करते थे । उनके लिए कहा गया है कि –

“यत्र सायं गृहो मुनिः”
अर्थात् उन्होंने अपना घर, आश्रम या कुटिया भी नहीं बनाई थी ।

वे निरन्तर भ्रमण करते रहते थे और जहाँ सन्ध्या होती थी वहीं पर घर मानकर रुक जाते थे । उनको विवाह की इच्छा नहीं थी । अतः उन्होंने बहुत कठिन शर्ते रखीं । कहा कि हमारे ही नाम वाली कन्या होनी चाहिए, कुतिया की भाॅति उसकी निद्रा हो, हिरनी की भाॅति सदैव सजग रहे और कौए की भाॅति इशारों को समझने वाली हो, भरण-पोषण के लिए हम पर निर्भर न हो आदि । इतनी शर्तें रखने पर भी उनके शर्त को पूर्ण करने वाली जरत्कारू नाम की कन्या उनको विवाह के लिए मिल गई । पर जिसका मन संसार में न रहे वह कितने दिन बॅधा रह सकता है ? उनको तो विरक्त ही रहना था इसलिए उन्होंने एक दिन बहाने से पत्नी जरत्कारू का त्याग कर दिया ।

विद्यार्थियों के लक्षण बताते हुए उन्होंने कहा कि विद्यार्थी को कौए की तरह प्रयास करने वाला, बगुले की तरह ध्यान लगाने वाला, कुत्ते की तरह शयन करने वाला, अल्प भोजन करने वाला और गृह का त्याग करने वाला होना चाहिए । यही विद्यार्थियों के पाॅच लक्षण हैं ।

स्वामिश्रीः के प्रवचन के पूर्व जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती न्याय वेदांत महाविद्यालय के वैदिक बटुकों एवं छत्तीसगढ से पधारे भागवताचार्य पं दुर्गेश जी ने मिलकर वी आर चोपडा द्वारा निर्मित प्रसिद्ध टेलीवीजन धारावाहिक महाभारत का गीत प्रस्तुत किया ।

कार्यक्रम का शुभारम्भ मंगलाचरण व गुरु पूजन से हुआ । जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती न्याय वेदांत महाविद्यालय के ऋग्वेद शाकल शाखा के छात्र पं विश्वजीत दुबे ने वैदिक मंगलाचरण किया । पौराणिक मंगलाचरण शिवम नायक ने किया । संचालन मयंकशेखर मिश्र ने तथा धन्यवाद ज्ञापन मनीष चतुर्वेदी जी ने किया ।

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