30 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी कांग्रेस, बहुमत से एक कदम दूर; डारा के समर्थन से 31 का आंकड़ा संभव—अब्दुल्ला अगवान, अजमत अली, उमर कुरैशी, जुल्फीकार अली खोखर और तैयब अली के नाम चर्चा में

झुंझुनूं।अजीत जांगिड़
नगर परिषद चुनाव परिणामों ने शहर की सियासत में कांग्रेस को मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है। 60 वार्डों वाली नगर परिषद में कांग्रेस ने 30 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया है। बहुमत के लिए 31 पार्षदों की जरूरत है और कांग्रेस इससे महज एक सीट दूर है। भाजपा को 15 तथा निर्दलीयों को भी 15 सीटें मिली हैं। ऐसे में अब नगर परिषद की नई सरकार के गठन से ज्यादा दिलचस्प मुकाबला सभापति की कुर्सी को लेकर शुरू हो गया है। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस खेमे में सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को साधने की कवायद तेज होने की संभावना है। खास तौर पर मुस्लिम पार्षदों और मुस्लिम राजनीतिक चेहरों में से सभापति पद के संभावित दावेदारों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हैं।
एक समर्थन और कांग्रेस के पास बहुमत
कांग्रेस के लिए सबसे अहम कड़ी निर्दलीय पार्षद पूर्व उपसभापति वीरेंद्र डारा हैं। डारा वार्ड 9 से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए हैं और पहले ही कांग्रेस के साथ होने की बात कह चुके हैं। ऐसे में उनका समर्थन कांग्रेस के 30 पार्षदों के साथ जुड़ता है तो आंकड़ा 31 तक पहुंच सकता है। यानी संख्याबल के लिहाज से कांग्रेस बोर्ड गठन की दहलीज पर खड़ी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि कांग्रेस अपने बहुमत को किस तरह सभापति पद के लिए राजनीतिक सहमति में बदलती है।
मुस्लिम चेहरे क्यों बने चर्चा का केंद्र?
नगर परिषद के राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस खेमे में मुस्लिम चेहरे सभापति पद की दौड़ में प्रमुखता से चर्चा में बताए जा रहे हैं। राजनीतिक हलकों में अब्दुल्ला अगवान, शहर ब्लॉक अध्यक्ष अजमत अली, उमर कुरैशी, जुल्फीकार खोखर और पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष तैयब अली के नामों की चर्चा है।
इनमें अजमत अली ने वार्ड 42 से जीत दर्ज की है, जबकि तैयब अली, जो निवर्तमान सभापति नगमा बानो के ससुर हैं, कांग्रेस के टिकट पर विजयी हुए हैं। वहीं पूर्व उपसभापति वीरेंद्र डारा का निर्दलीय जीतना और कांग्रेस के साथ समर्थन की घोषणा करना भी पूरे समीकरण में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कांग्रेस के सामने चुनौती—सहमति का चेहरा कौन?
कांग्रेस के पास संख्याबल भले ही मजबूत है, लेकिन सभापति पद का फैसला केवल सीटों के गणित से नहीं होगा। पार्टी को सामाजिक प्रतिनिधित्व, पार्षदों की पसंद, स्थानीय राजनीतिक प्रभाव और सभी गुटों को साथ लेकर चलने के समीकरण को साधना होगा। यही कारण है कि सभापति पद के संभावित नामों को लेकर अभी से राजनीतिक जोड़-तोड़ और चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। यदि मुस्लिम चेहरे को प्राथमिकता मिलती है तो पार्टी के सामने कई दावेदारों में से सर्वस्वीकार्य चेहरा चुनना बड़ी चुनौती होगी।
भाजपा की सीटें बढ़ीं, लेकिन सत्ता की दौड़ में पीछे
भाजपा के लिए इस बार परिणाम मिश्रित रहे। 2019 में भाजपा के खाते में 10 सीटें थीं, जो इस बार बढ़कर 15 हो गईं। यानी पार्टी को पांच सीटों का फायदा हुआ, लेकिन कांग्रेस के 30 के मुकाबले भाजपा अभी भी 15 सीट पीछे है। दूसरी ओर 15 निर्दलीय पार्षदों की मौजूदगी ने नगर परिषद के समीकरणों को रोचक बना दिया है। हालांकि कांग्रेस के पास डारा का समर्थन मिलने की स्थिति में बहुमत का आंकड़ा पूरा हो सकता है, फिर भी अंतिम राजनीतिक तस्वीर सभापति चुनाव के दौरान ही पूरी तरह साफ होगी।
जनता के रुझान ने बदली शहर की सियासी तस्वीर
परिणामों ने यह संकेत जरूर दिया है कि इस बार झुंझुनूं शहर में मतदाताओं ने कांग्रेस को सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभारा है। 30 सीटों के साथ कांग्रेस का सबसे बड़ा दल बनना, भाजपा का 15 सीटों पर रूकना और निर्दलीयों का 15 सीटें जीतना—तीनों ही परिणाम शहर की बदली हुई राजनीतिक तस्वीर को सामने रखते हैं। अब असली परीक्षा कांग्रेस की है। बोर्ड बनाना लगभग आसान नजर आ रहा है, लेकिन सभापति चुनना राजनीतिक रूप से सबसे बड़ी चुनौती होगा। मुस्लिम चेहरों में से किस नाम पर सहमति बनती है और वीरेंद्र डारा सहित निर्दलीयों की भूमिका किस रूप में सामने आती है, इस पर अब शहर की सियासत की नजरें टिकी हैं।












