तुरंत हस्तक्षेप की मांग, 12वीं की मेरिट से ही सीधा सलेक्शन हो, नीट यूजी—जेईई बंद करो — डॉ. दिलीप मोदी

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नीट पेपर लीक 2026 की पुनरावृत्ति रोकने के स्थाई समाधान के लिए नीसा का प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र

झुंझुनूं। अजीत जांगिड़
नीट यूजी 2026 परीक्षा रद्द करने, कोचिंग उद्योग की एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों, निरंतर होते पेपर लीक और इसके परिणामस्वरूप औपचारिक शिक्षा तंत्र के क्षरण पर शिक्षा जगत में गहरी चिंता सामने आई है। देश भर के 36 हजार 400 से अधिक बजट प्राइवेट स्कूलों का प्रतिनिधित्व करने वाले शीर्ष संगठन नीसा, जिससे देश के 2.3 करोड़ से अधिक विद्यार्थियों का शैक्षणिक भविष्य तय होता है, ने पेपर लीक होने और 23 लाख विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ पर इस विषय पर गंभी एक्शन लेने की बात कही है। नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स एलायंस (नीसा) की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखा गया है। संगठन की ओर से इस संदर्भ में तुरंत हस्तक्षेप की मांग की गई है। नीसा के नेशनल जॉइंट सेक्रेटरी डॉ. दिलीप मोदी ने बताया कि पत्र में स्पष्ट किया गया है कि नीट यूजी 2026 को रद्द करना गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय है। यह मात्र एक परीक्षा का प्रशासनिक स्थगन नहीं है, बल्कि यह देश के 23 लाख विद्यार्थियों और उनके परिवारों की आकांक्षाओं पर वज्रपात है। दुख की बात है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। बल्कि एक दीर्घकालिक चुनौती बन चुकी है। पेपर लीक की निरंतर होती घटनाएं, अनुचित साधनों का प्रयोग और परीक्षाओं का बार-बार रद्द होना युवाओं में गहरी हताशा का कारण बन रहा है। इससे अभिभावकों पर भारी आर्थिक व मानसिक बोझ पड़ रहा है और राष्ट्रीय परीक्षा प्रणालियों की विश्वसनीयता पर जनमानस का विश्वास डगमगा रहा है। केंद्रीकृत प्रवेश परीक्षाओं की अनिवार्यता ने कोचिंग को एक अनियंत्रित और अत्यधिक व्यावसायिक उद्योग में बदल दिया है। पेपर लीक, भ्रामक विज्ञापन, झूठे दावे, महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाना और परीक्षा केंद्रों पर हेरफेर दुर्भाग्यवश इस उद्योग की कार्यप्रणाली का हिस्सा बन चुके हैं। यह देखा गया है कि कक्षा छह जैसी प्रारंभिक अवस्था से ही छात्र औपचारिक स्कूली शिक्षा छोड़कर देश भर के कोचिंग संस्थानों का रुख कर रहे हैं। परिणामस्वरूप, स्कूल और कॉलेज केवल कागजी तौर पर फर्जी उपस्थिति और फर्जी प्रायोगिक परीक्षाओं के केंद्र बनकर रह गए हैं। इस प्रवृत्ति ने औपचारिक शिक्षा, शिक्षकों की भूमिका और चरित्र-निर्माण के मूल्यों को हाशिए पर धकेल दिया है। वास्तविक शिक्षा और सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास का मूल उद्देश्य पूरी तरह से व्यावसायिकता, शॉर्टकट और रटंत प्रणाली की भेंट चढ़ गया है। डमी स्कूलिंग की इस व्यवस्था को तत्काल बंद कर देना चाहिए। अभिभावकों पर स्कूल की फीस के साथ-साथ कोचिंग की भारी-भरकम फीस और हॉस्टल-मेस के खर्चों का दोहरा वित्तीय बोझ पड़ रहा है। यह स्थिति मध्यम और निम्न-आय वर्ग के परिवारों के लिए असहनीय मानसिक और आर्थिक तनाव पैदा कर रही है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग हाशिए पर चले गए हैं। सीमांत किसानों, दैनिक वेतनभोगी मजदूरों और वंचित समाज के बच्चे, जो सरकारी स्कूलों या शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत पढ़ते हैं। वे इस व्यवस्था में पूरी तरह पिछड़ रहे हैं। दूर-दराज के महंगे कोचिंग सेंटर्स और हॉस्टल के खर्चों को वहन करने में असमर्थ होने के कारण, वे इस असमान प्रतियोगिता की दौड़ से स्वतः ही बाहर हो जाते हैं। नीट, जेईई और सीयूईटी पर अत्यधिक निर्भरता ने सीबीएसई सहित सभी राज्य बोर्ड परीक्षाओं की प्रासंगिकता को लगभग समाप्त कर दिया है। परिणाम यह है कि छात्र के 12 वर्षों के निरंतर शैक्षणिक परिश्रम का मूल्यांकन महज तीन घंटे की एक एकल प्रवेश परीक्षा से तय हो रहा है। इसके अतिरिक्त, बोर्ड परीक्षाओं और इन प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम, कठिनाई स्तर तथा मूल्यांकन पद्धति में एक रहस्यमयी भिन्नता है, जो छात्रों को भ्रमित करती है। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि अत्यंत चिंता के साथ यह भी संज्ञान में लाना है कि शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 16 जनवरी 2024 को जारी ‘कोचिंग सेंटरों के नियमन हेतु दिशा निर्देश’ अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू नहीं किए जा सके हैं। कड़े प्रवर्तन के अभाव में, कोचिंग संस्थानों की अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियां बेधड़क जारी हैं, जिससे इन दिशानिर्देशों का मूल उद्देश्य ही विफल हो रहा है। किसी भी स्थायी सुधार के लिए केवल लक्षणों का नहीं, बल्कि समस्याओं की जड़ का इलाज आवश्यक है।

पत्र में दिए पीएम को सुझाव

नीसा के नेशनल जॉइंट सेक्रेटरी डॉ. दिलीप मोदी ने बताया कि प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र में नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स अलायंस) की ओर से इस अवस्था से निपटने के लिए कुछ सुझाव भी दिए गए हैं। जिसमें सीबीएसई और राज्य बोर्डों द्वारा आयोजित परीक्षाएं सरकारी निगरानी और कड़े गोपनीयता प्रोटोकॉल के तहत होती हैं। इसलिए औपचारिक स्कूली शिक्षा की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करते हुए, उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए कक्षा 12वीं के बोर्ड मेरिट को प्राथमिक आधार बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। बोर्ड परीक्षाओं में सैद्धांतिक (थ्योरी) परीक्षा को 100 प्रतिशत भारांश (वेटेज) दिया जाए। जबकि आंतरिक मूल्यांकन और व्यावहारिक परीक्षाओं को ग्रेडिंग प्रणाली के माध्यम से अलग से दर्शाया जाए। इस पूरी प्रक्रिया की गोपनीयता और शुचिता बनाए रखने के लिए आईएएस—आरएएस स्तर के अधिकारियों को पर्यवेक्षक नियुक्त किया जा सकता है। कोचिंग संस्थानों को शिक्षा के बजाय व्यावसायिक सेवा के रूप में वर्गीकृत किया जाए और उन्हें उच्चतम जीएसटी दर, तार्किक शुल्क नियंत्रण, भ्रामक विज्ञापनों पर दंड और अनिवार्य पंजीकरण के दायरे में लाया जाए। स्कूलों और कोचिंग सेंटरों के बीच डमी एडमिशन और फर्जी अटेंडेंस के सांठगांठ को संज्ञेय अपराध घोषित किया जाए। साथ ही, 16 जनवरी 2024 के दिशा—निर्देशों को देश भर में समयबद्ध तरीके से लागू किया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति—2020 की मूल भावना का क्रियान्वयन सही होना चाहिए। एनईपी 2020 स्कूली शिक्षा को सुदृढ़ करने की वकालत करती है। अत्यधिक तनाव पैदा करने वाली प्रवेश परीक्षाओं के स्थान पर नीति के अनुरूप सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की ओर चरणबद्ध तरीके से कदम बढ़ाए जाने चाहिए। प्रधानमंत्री से निवेदन किया गया है कि आपके दूरदर्शी नेतृत्व में देश ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की है, विमुद्रीकरण जैसे युगांतकारी निर्णय लिए हैं और ऑपरेशन सिंदूर जैसी सटीक व प्रभावी कार्यवाहियों सहित दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक आम चुनावों को अनुकरणीय निष्पक्षता से संपन्न कराया है। इसलिए नीसा ने विश्वास व्यक्त किया है कि देश के भीतर शैक्षणिक परीक्षाओं में पारदर्शिता और शुचिता स्थापित करना राष्ट्र की क्षमता के लिए पूरी तरह से साध्य है। कोचिंग संस्कृति के अनियंत्रित प्रसार ने हमारे औपचारिक स्कूल और कॉलेज तंत्र को भीतर से खोखला कर दिया है। यदि हमारे शैक्षणिक संस्थान ही डमी बनकर रह जाएंगे। तो वर्ष 2047 तक विकसित भारत और विश्वगुरु के राष्ट्रीय संकल्पों की सिद्धि में गंभीर चुनौतियां उत्पन्न होंगी। एक चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार की जाए जिसके तहत नीट और जेईई जैसी केंद्रीकृत प्रवेश परीक्षाओं के स्थान पर बोर्ड परीक्षा के अंकों के आधार पर मेरिट-लिंक्ड प्रवेश प्रणाली लागू की जा सके। इस संवेदनशील विषय की समग्र जांच के लिए एक उच्च स्तरीय राष्ट्रीय परीक्षा सुधार आयोग का गठन किया जाए। जिसमें नीसा सहित सभी हितधारकों को प्रतिनिधित्व मिले ताकि धरातल की वास्तविकताओं को समझा जा सके।