प्रतिपूर्ति राशि बढ़ाने, भुगतान समयबद्ध करने और पात्रता सत्यापन को पारदर्शी बनाने की उठाई मांग
झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन तथा निजी विद्यालयों के समक्ष आ रही व्यावहारिक समस्याओं के समाधान को लेकर निजी विद्यालय संचालकों ने राज्य सरकार से व्यवस्था में आवश्यक सुधार करने की मांग की है। संचालकों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में कई ऐसे बिंदु हैं, जिनमें संशोधन कर आरटीई के मूल उद्देश्य को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है तथा विद्यालयों के सुचारू संचालन को भी सुनिश्चित किया जा सकता है। निजी विद्यालय संचालकों के अनुसार वर्तमान में आरटीई के तहत प्रवेशित विद्यार्थियों के लिए सरकार द्वारा प्रति विद्यार्थी लगभग 13 हजार रूपये वार्षिक प्रतिपूर्ति प्रदान की जाती है, जबकि शिक्षा की वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक है। शिक्षकों के वेतन, भवन रखरखाव, बिजली, परिवहन, तकनीकी संसाधनों एवं अन्य संचालन व्ययों में लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में संबंधित विद्यालय की निर्धारित फीस के अनुरूप ही प्रतिपूर्ति राशि तय की जानी चाहिए, ताकि विद्यालयों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।संचालकों ने बताया कि आरटीई विद्यार्थियों के लिए पुस्तकों एवं शैक्षणिक सामग्री के नाम पर निर्धारित 250 रूपये की राशि भी वर्तमान परिस्थितियों में अपर्याप्त है। उनका कहना है कि यदि सरकार इस मद में सहायता प्रदान करती है तो राशि वास्तविक खर्च के अनुरूप निर्धारित की जानी चाहिए। विद्यालय संचालकों ने आरटीई प्रतिपूर्ति के भुगतान में हो रही देरी पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि अनेक विद्यालयों को करीब डेढ़ वर्ष से भुगतान प्राप्त नहीं हुआ है, जिसके कारण वित्तीय संकट की स्थिति उत्पन्न हो रही है। उन्होंने सरकार से समयबद्ध भुगतान व्यवस्था लागू करने की मांग की, ताकि विद्यालयों का नियमित संचालन प्रभावित न हो। संचालकों ने यह भी सुझाव दिया कि आरटीई का लाभ वास्तविक रूप से आर्थिक रूप से कमजोर एवं जरूरतमंद विद्यार्थियों तक पहुंचे, इसके लिए पात्रता सत्यापन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। उनका कहना है कि कई मामलों में आय प्रमाण-पत्र वास्तविक आय को प्रतिबिंबित नहीं करते, जिससे पात्र परिवार योजना के लाभ से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में अभिभावकों की आय का सत्यापन पैन कार्ड एवं आयकर अभिलेखों के आधार पर किया जाना चाहिए।निजी विद्यालय संचालकों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने में निजी विद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि लाभार्थियों के चयन और सत्यापन की प्रक्रिया पारदर्शी एवं वास्तविक आय पर आधारित होगी तो अधिक जरूरतमंद विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा और शिक्षा व्यवस्था भी अधिक प्रभावी एवं भरोसेमंद बन सकेगी। संचालकों ने राज्य सरकार से इन सुझावों पर गंभीरता से विचार करते हुए आवश्यक संशोधन एवं सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की है, ताकि शिक्षा के अधिकार अधिनियम का उद्देश्य पूर्ण हो सके तथा विद्यालयों की गुणवत्ता एवं स्थिरता भी बनी रहे।














