कुआं पूजन, छूछक और सभी परंपराएं निभाकर दिया समानता का संदेश
झुंझुनूं I अजीत जांगिड़
समाज में वर्षों से यह परंपरा रही है कि बेटे के जन्म पर कुआं पूजन, दशोठण और छूछक जैसे आयोजन बड़े उत्साह से किए जाते हैं। लेकिन अब बदलती सोच के साथ बेटियों के जन्म पर भी वही सम्मान और खुशियां मनाई जाने लगी हैं। जो कभी केवल बेटों के हिस्से में आती थीं। झुंझुनूं जिले के चनाना क्षेत्र के निकट स्थित सरदारपुरा लोयल गांव में ऐसा ही प्रेरणादायी उदाहरण देखने को मिला। जहां नवजात बेटी के जन्म पर पूरे रीति-रिवाज और परंपराओं के साथ भव्य कुआं पूजन एवं छूछक कार्यक्रम आयोजित किया गया। सरदारपुरा लोयल गांव निवासी किसान मातूराम बोयल के परिवार में उस समय खुशियों की लहर दौड़ गई जब उनके पुत्र अरविंद बोयल की धर्मपत्नी राजकुमारी ने पुत्री अपेक्षा बोयल को जन्म दिया। परिवार ने बेटी के आगमन को किसी बेटे से कम नहीं माना और पारंपरिक रस्मों के साथ उत्सव मनाकर समाज को सकारात्मक संदेश दिया। नवजात अपेक्षा के जन्म पर आयोजित कुआं पूजन समारोह में परिवार और ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। विशेष बात यह रही कि ननिहाल पक्ष की ओर से प्रताप आल्हा, मामा आकाश आल्हा सहित अन्य परिजन गांव पहुंचे और परंपरानुसार छूछक भरकर बेटी को आशीर्वाद दिया। परिवार ने वे सभी रस्में निभाईं जो आमतौर पर बेटे के जन्म पर की जाती हैं। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने कहा कि बेटियां आज हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। ऐसे आयोजनों से समाज में यह संदेश जाता है कि बेटा और बेटी दोनों समान हैं तथा दोनों के जन्म पर समान खुशियां मनाई जानी चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता विकास आल्हा ने कहा कि बेटियों को सम्मान देना और उनके जन्म पर उत्सव मनाना एक जागरूक एवं प्रगतिशील समाज की पहचान है। उन्होंने कहा कि जब परिवार स्वयं ऐसी पहल करते हैं तो समाज में सकारात्मक बदलाव की गति और तेज होती है। इस अवसर पर गुरुदयाल बोयल, माईलाल बोयल, खेताराम, कमल बोयल, सामाजिक कार्यकर्ता विकास आल्हा, व्याख्याता शीशराम आल्हा, डॉ. राजेंद्र मेहरिया, धर्मपाल शीला, अनिल, विक्रम सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने नवजात बेटी अपेक्षा को शुभाशीष देते हुए उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। बेटी अपेक्षा के जन्म पर आयोजित यह समारोह पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोगों का मानना है कि बेटियों के सम्मान और समान अधिकारों की दिशा में ऐसे आयोजन समाज के लिए प्रेरणा हैं। यह आयोजन न केवल एक परिवार की खुशी का उत्सव था, बल्कि बेटा-बेटी समानता का एक सशक्त सामाजिक संदेश भी बन गया।










