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कौन बनेगा झुंझुनूं नगर परिषद का सभापति? क्या ‘किंगमेकर’ बन सकते हैं निर्दलीय?

भाजपा की बाड़ेबंदी में प्रत्याशियों के साथ निर्दलीयों की एंट्री ने बढ़ाया सस्पेंस; विधायक राजेंद्र भांबू के आवास से दो बसों में रवाना हुए समर्थित पार्षद—14 सितंबर को ईवीएम खुलने के साथ शुरू होगी बोर्ड की असली बाजी

झुंझुनूं। अजीत जांगिड़
झुंझुनूं जिले में नगर निकाय के प्रथम चरण का मतदान 9 सितंबर को हुआ है वहीं दूसरे चरण का मतदान भले ही 11 सितंबर को होना है, लेकिन झुंझुनूं में सभापति की कुर्सी को लेकर सियासी शतरंज अभी से शुरू हो गई है। गुरूवार को भाजपा ने अपने समर्थित पार्षद प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी कर राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि झुंझुनूं से भाजपा विधायक राजेंद्र भांबू के आवास पर भाजपा प्रत्याशियों के साथ कई निर्दलीय प्रत्याशी भी पहुंचे।

दोपहर से जुटे प्रत्याशियों को देर शाम दो बसों से एक अज्ञात स्थान के लिए रवाना किया गया। सभी प्रत्याशी अपने बैग लेकर पहुंचे थे। आधिकारिक तौर पर उन्हें कहां ले जाया गया, इसकी पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन राजनीतिक संदेश साफ माना जा रहा है—भाजपा मतदान से पहले अपने संभावित समर्थकों को एकजुट रखने के साथ-साथ 14 सितंबर के बाद बनने वाले बोर्ड के गणित पर भी नजर रख रही है।

भाजपा के साथ निर्दलीय… आखिर क्यों?

जानकारी के अनुसार विधायक आवास पर भाजपा प्रत्याशियों के साथ आजम भाटी, जब्बार फुल्का, इशाक फुल्का, खादिम खोकर, इदरीश मिंडा, पिंटू कुमावत और मनोज सहित निर्दलीय प्रत्याशियों की मौजूदगी ने सबसे ज्यादा सवाल खड़े किए हैं। इनमें कुछ प्रत्याशियों के परिवार के सदस्य संबंधित वार्डों से चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में यह साफ है कि चुनावी मुकाबला अब केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रह गया है। यदि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो यही निर्दलीय चेहरे बोर्ड की सत्ता की चाबी बन सकते हैं।

सभापति की दौड़ में कौन-कौन?

झुंझुनूं नगर परिषद में सभापति पद को लेकर अभी आधिकारिक रूप से कुछ तय नहीं है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में कई नाम चर्चा में हैं। जिनमें प्रमुख रूप से भाजपा के झुंझुनूं विधायक राजेंद्र भांबू के दामाद और वार्ड नंबर 49 से भाजपा प्रत्याशी मनु धनखड़ यदि विजय का परचम फहराते हैं तो निर्दलीय प्रत्याशियों के साथ जोड़- तोड़ कर उनका सभापति बनना लगभग तय माना जा रहा है वहीं कांग्रेस समर्थित निर्दलीय पूर्व उपसभापति वीरेंद्र डारा, कांग्रेस के अब्दुल्ला अगवान , कांग्रेस के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष तैयब अली, भाजपा के डॉ. राजेश बाबल, भाजपा के लीलाधर जाखड़ , भाजपा के गुलजारीलाल शर्मा , प्रमोद जानू के सभापति बनने को लेकर भी जन चर्चाएं चल रही हैं।

इनमें लीलाधर जाखड़ की दावेदारी को राजनीतिक रूप से इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वे पूर्व सांसद नरेंद्र कुमार के दामाद और भाजपा जिलाध्यक्ष हर्षिनी कुलहरि के ननदौई हैं। वहीं वार्ड 49 के भाजपा प्रत्याशी मनु धनखड़ भी सभापति पद के प्रमुख संभावित चेहरों में चर्चा में हैं। मनु धनखड़ विधायक राजेंद्र भांबू के दामाद हैं। ऐसे में उनका वार्ड 49 का चुनाव परिणाम केवल एक पार्षद की जीत-हार नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर भी राजनीतिक संदेश देने वाला माना जा रहा है।

वार्ड 49—एक सीट, कई संदेश

वार्ड 49 में भाजपा के मनु धनखड़ के सामने भाजपा से बगावत कर निर्दलीय मैदान में उतरे डॉ. कमलचंद सैनी हैं। यही वजह है कि यह मुकाबला पूरे चुनाव में सबसे चर्चित मुकाबलों में रहा। अगर मनु धनखड़ चुनाव जीतते हैं तो इसे विधायक भांबू के लिए राहत और मजबूत राजनीतिक संदेश माना जाएगा। वहीं परिणाम उलट हुआ तो भाजपा के अंदर टिकट वितरण और स्थानीय समीकरणों पर सवाल उठ सकते हैं।

41 टिकटों से बोर्ड की बाजी तक… भाजपा के सामने सबसे बड़ा गणित

झुंझुनूं नगर परिषद के 60 वार्डों में भाजपा ने 41 वार्डों में ही प्रत्याशी उतारे, जबकि कांग्रेस ने 51 वार्डों में उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। यानी भाजपा के सामने पहला सवाल यही है कि बिना सभी वार्डों में उम्मीदवार उतारे बोर्ड के बहुमत तक कैसे पहुंचा जाएगा?

यहीं से निर्दलीयों का गणित महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर भाजपा मजबूत स्थिति में रहती है लेकिन बहुमत से कुछ कदम दूर रह जाती है तो भाजपा समर्थित निर्दलीय पार्षदों की भूमिका बढ़ सकती है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी इस समीकरण को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी। इसलिए 14 सितंबर की मतगणना के बाद असली सियासी मुकाबला शुरू होने की संभावना है।

‘किंगमेकर’ बन सकते हैं निर्दलीय

चुनाव परिणाम त्रिशंकु रहने की स्थिति में निर्दलीय पार्षदों की पूछ अचानक बढ़ सकती है। ऐसे में कौन किसके साथ जाता है, कौन किस पद की दावेदारी करता है और कौन किस शर्त पर समर्थन देता है—इन सवालों के जवाब बोर्ड गठन की तस्वीर तय करेंगे। हालांकि अभी से किसी तरह के सौदे या जोड़-तोड़ का दावा करना जल्दबाजी होगी। फिलहाल इतना जरूर है कि दोनों प्रमुख दलों की नजर निर्दलीय प्रत्याशियों पर बनी हुई है।

झुंझुनूं से भाजपा विधायक राजेंद्र भांबू के लिए दोहरी परीक्षा

नगर परिषद चुनाव भाजपा विधायक राजेंद्र भांबू के लिए भी प्रतिष्ठा का चुनाव है। एक तरफ पार्टी को नगर परिषद में मजबूत स्थिति में लाने की चुनौती है, दूसरी तरफ वार्ड 49 में उनके दामाद मनु धनखड़ का मुकाबला भाजपा के बागी डॉ. कमलचंद सैनी से है। यानी 14 सितंबर को आने वाला परिणाम यह भी बताएगा कि भांबू की संगठन पर पकड़ कितनी मजबूत रही और भाजपा का टिकट वितरण मतदाताओं के बीच कितना प्रभावी रहा।

ओला परिवार से लेकर तीन पूर्व मंत्रियों तक—नतीजे खोलेंगे सियासी कुंडली

झुंझुनूं नगर परिषद के साथ बगड़ और सुलताना के परिणाम कांग्रेस सांसद बृजेन्द्र सिंह ओला और अमित ओला के प्रभाव की भी परीक्षा माने जा रहे हैं। वहीं पहले चरण में खेतड़ी, नवलगढ़ और उदयपुरवाटी से जुड़े निकायों के परिणाम पूर्व मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह, डॉ. राजकुमार शर्मा और राजेंद्र सिंह गुढ़ा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजनीतिक चर्चा का विषय बनेंगे।

इधर भाजपा के झुंझुनूं विधायक राजेंद्र भांबू , नवलगढ़ विधायक विक्रम सिंह जाखल और खेतड़ी विधायक इंजी.धर्मपाल गुर्जर तथा कांग्रेस के उदयपुरवाटी विधायक भगवानाराम सैनी के विधानसभा क्षेत्रों से जुड़े निकाय चुनावों के परिणाम भी विधायकों की शहरी राजनीतिक पकड़ का संकेत देंगे।

पुराने आंकड़े बनाम इस बार की नई तस्वीर

पिछले चुनाव में संबंधित 210 वार्डों में भाजपा ने 35, कांग्रेस ने 96 और निर्दलीयों ने 79 वार्ड जीते थे। इस बार सुलताना, जाखल और डूंडलोद के जुड़ने से कुल वार्डों की संख्या बढ़कर 275 हुई है। बगड़ के एक वार्ड में निर्विरोध निर्वाचन के कारण 274 वार्डों में मतदान हुआ।इस बार मुकाबले को रोचक बनाने वाले कई फैक्टर हैं—नई नगरपालिकाएं, बागी प्रत्याशी, बड़ी संख्या में निर्दलीय, टिकट वितरण से नाराजगी और बोर्ड गठन का गणित।

अब सवाल सिर्फ ‘कौन जीतेगा?’ नहीं… ‘किसके साथ जाएगा?’

11 सितंबर को नगर निकाय के दूसरे चरण के जनता देगी वोट, 14 सितंबर को ईवीएम बताएगी जनादेश; इसके बाद शुरू होगी सभापति की कुर्सी के लिए असली सियासी शतरंज ।झुंझुनूं में भाजपा की बाड़ेबंदी ने संकेत दे दिया है कि राजनीतिक दलों ने मतदान से आगे की रणनीति पर भी काम शुरू कर दिया है।भाजपा प्रत्याशियों के साथ निर्दलीयों की मौजूदगी ने इस सवाल को और बड़ा कर दिया है कि यदि बहुमत का आंकड़ा किसी एक दल से दूर रहा तो नगर परिषद की सत्ता की चाबी आखिर किसके हाथ होगी?

11 सितंबर को मतदाता अपना फैसला ईवीएम में बंद करेंगे। 14 सितंबर को ईवीएम खुलेगी तो केवल पार्षदों की जीत-हार सामने नहीं आएगी, बल्कि यह भी तय होने लगेगा कि झुंझुनूं नगर परिषद में अगला सभापति कौन हो सकता है और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए किसे किसका हाथ थामना पड़ेगा। यही वजह है कि झुंझुनूं में इस बार चुनाव की असली कहानी मतदान केंद्र से ज्यादा 14 सितंबर के बाद बोर्ड गठन की सियासी बाजी में लिखी जाने वाली है।

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