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हनुमानगढ़ में शहीदी जोड़ मेला, हजारों संगत ने दी बाबा सुखा सिंह-महताब सिंह को श्रद्धांजलि

हनुमानगढ़ के गुरुद्वारा शहीद बाबा सुखा सिंह-बाबा महताब सिंह में शहीदी जोड़ मेला

जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह 96 करोड़ी मुखी बुढ़ा दल ने की शिरकत, हजारों संगत ने बढ़ाई मेले की रौनक

हनुमानगढ़।हिमांशु मिड्ढा
नगर के ऐतिहासिक गुरूद्वारा शहीद बाबा सुखा सिंह-बाबा महताब सिंह छावनी बुढ़ा दल में गुरूवार 10 सितम्बर 2026 (25 भादो) को सालाना शहीदी जोड़ मेला बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया गया। यह मेला संगतों के सहयोग से पंथ रतन सिंह साहब जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह जी 96 करोड़ी मुखी बुढ़ा दल की अगुवाई में आयोजित हुआ। 18वीं सदी के महान शहीदों की याद में आयोजित यह मेला न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि युवाओं को पंथ और समाज की सेवा के लिए प्रेरित करता है।

अखंड पाठ और खुले दीवान से हुई शुरुआत सुबह 10 बजे लड़ीवार 151 अखंड पाठ साहिब के भोग डाले गए। इसके बाद फोर्ट स्कूल ग्राउंड में खुले दीवान सजाए गए, जिसमें हजारों की संख्या में संगत शामिल हुई। भारी भीड़ के कारण नगर में यातायात व्यवस्था बिगड़ गई और लंबी-लंबी कतारों में वाहन फंसे रहे। पुलिस प्रशासन और सेवादारों ने मिलकर यातायात व्यवस्था को संभाला। गुरूद्वारा के सेवादार बाबा जोगा सिंह ने बताया कि वर्ष 1739 में अफगान शासक नादिरशाह की सेना ने अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थीं। उस समय लाहौर के जनरल जकरीया खां ने ‘मस्सेरंगड़’ को श्री हरमंदर साहिब का मुखी नियुक्त किया, जिसने दरबार साहिब को अय्याशी का अड्डा बना दिया। जब यह बात बुढ़ा दल के चौथे मुखी और श्री अकाल तख्त के जत्थेदार बाबा जस्सा सिंह अहलुवालिया को पता चली तो उन्होंने हनुमानगढ़ की धरती से शहीद बाबा सुखा सिंह और शहीद बाबा महताब सिंह को मस्सेरंगड़ को सबक सिखाने अमृतसर भेजा।

दोनों वीरों ने मस्सेरंगड़ का वध कर उसका सिर बरछे पर टांगा और वापसी में हनुमानगढ़ में विश्राम किया। उनकी उसी शहादत और बलिदान की स्मृति में हर वर्ष यह शहीदी मेला मनाया जाता है। खुले दीवानों में संत-महापुरुष, निहंग सिंह जत्थेबंदियों के मुखी साहिबान तथा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के मुख्य सेवादार भाई गुरप्रीत सिंह,बाबा जस्सा सिंह,सुखविन्द्र सिंह मोर,विश्वप्रताप सिंह,लखविन्द्र सिंह पारस ढाडी जत्था,जसवीर सिंह मान,जसविन्द्र सिंह बालयावाली,शेर सिंह जस्सी बगवाली,शेर सिंह शिविया सहित पंथ की अनेक प्रमुख हस्तियां पहुंचेंगी ।

कथा वाचक सहित खालसा पंथ के सिरमौर रागी,ढाडी एवं कथावाचक गुरु इतिहास एवं गुरमत विचारों से संगत को निहाल किया।ंकथा-कीर्तन द्वारा संगत को निहाल किया। जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह जी ने गुरू इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सिख इतिहास बलिदान, त्याग और धर्मनिष्ठा का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने बताया कि गुरू नानक देव जी ने सत्य, नाम सिमरन और सेवा का मार्ग दिखाया। उनके बाद आए सभी गुरुओं ने मानवता, न्याय और समानता के लिए कार्य किया। गुरु अर्जुन देव जी ने सत्य की राह में शहादत स्वीकार की, वहीं गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने मीरी-पीरी का संदेश दिया। गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश बलिदान कर दिया।

अंत में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की और “चढ़दी कला” का संदेश दिया। उन्होने कहा कि सिख गुरुओं की यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित थी। उन्होंने निस्वार्थ सेवा, भाईचारे और इंसाफ का मार्ग प्रशस्त किया। शहीद बाबा सुखा सिंह और बाबा महताब सिंह जैसे वीरों ने भी इस परंपरा को जीवित रखते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। जत्थेदार जी ने संगत को संदेश दिया कि हमें अपने गुरुओं के उपदेशों और शहादतों से प्रेरणा लेकर जीवन में सच्चाई, सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए। यही सच्चा श्रद्धांजलि और गुरुओं के इतिहास का सम्मान है। उन्होंने कहा कि नशा मनुष्य की सामाजिक, पारिवारिक और धार्मिक प्रवृत्ति को नष्ट करता है।

युवाओं को खेलों से जुड़कर स्वस्थ जीवन जीने और समाज को प्रेरित करने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने संगत को पर्यावरण संरक्षण के लिए एक-एक पौधा लगाने और उसकी देखभाल करने की अपील की। अमृत संचार और सेवा मेले के दौरान बुढ़ा दल से पहुंचे पाँच प्यारों ने श्रद्धालुओं को अमृत संचार कराकर गुरु वाले बनाया। संगतों के लिए जगह-जगह भंडारे और छबीलों का आयोजन किया गया। मेले में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं ने ठंडी लस्सी, मीठा पानी, पकोड़े, बैड पकोड़े, जलजीरा, भेलपुरी और बूंदी के भंडारे लगाए।

मेले का समापन और आभार गुरूद्वारा प्रबंधक बाबा जोगा सिंह ने मेले में शामिल हुई संगतों, पुलिस प्रशासन, जिला प्रशासन और सभी धार्मिक संस्थाओं का धन्यवाद व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह मेला न केवल शहीदों की शौर्यगाथा को याद दिलाता है बल्कि वर्तमान पीढ़ी को पंथ, धर्म और समाज की सेवा के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार हनुमानगढ़ की ऐतिहासिक धरती पर आयोजित यह शहीदी जोड़ मेला श्रद्धा, भक्ति और सेवा भाव की मिसाल बन गया।

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