सुबोध कुमार अग्रवाल: जिन्होंने धन नहीं, विरासत कमाई
— दूलाराम सहारण,
पूर्व अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य अकादेमी
“बांणियै रै जामेड़ा दांम कमावै पण सुबोध-गोविंद जस कमायौ..!”
राजस्थान की लोकभाषा में कही गई यह उक्ति केवल एक कहावत नहीं, बल्कि स्वर्गीय सुबोध कुमार अग्रवाल और उनके छोटे भाई गोविंद अग्रवाल के जीवन का सटीक परिचय है। सामान्यतः व्यापारी परिवारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे व्यापार बढ़ाएं, संपत्ति अर्जित करें और आर्थिक समृद्धि का विस्तार करें। लेकिन चूरू के इस अग्रवाल परिवार के दो बेटों ने एक अलग ही राह चुनी। उन्होंने धन कमाने के बजाय समाज की सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने और इतिहास को संरक्षित करने का संकल्प लिया। आज उनके जाने के वर्षों बाद भी उनका नाम सम्मान और श्रद्धा से लिया जाता है।चूरू की धरती पर स्थापित लोक संस्कृति शोध संस्थान “नगरश्री” केवल एक संस्था नहीं, बल्कि उनके दूरदर्शी चिंतन और अथक परिश्रम का जीवंत स्मारक है। ऐसे समय में जब लोक संस्कृति, इतिहास और पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण को लेकर समाज में जागरूकता सीमित थी, तब सुबोध कुमार अग्रवाल ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य प्रारंभ किया। उन्होंने लोक परंपराओं, प्राचीन दस्तावेजों, दुर्लभ वस्तुओं और सांस्कृतिक विरासत को एकत्रित कर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया।उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में “चूरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास” जैसी महत्वपूर्ण कृति का प्रकाशन शामिल है। इसके अलावा शोधपरक पत्रिका “शोधश्री” के माध्यम से उन्होंने इतिहास, साहित्य और संस्कृति के गंभीर अध्येताओं को एक मंच उपलब्ध कराया। नगरश्री के माध्यम से आयोजित साहित्यिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने चूरू को प्रदेश के सांस्कृतिक मानचित्र पर नई पहचान दिलाई।यह यात्रा आसान नहीं थी। संस्था के संचालन, भवन निर्माण और आयोजनों के लिए संसाधनों की आवश्यकता होती थी। आर्थिक सहयोग जुटाने के लिए जब वे समाज के प्रतिष्ठित व्यापारियों के पास जाते, तो कई बार उन्हें यह सुनना पड़ता था— “बनिये का बेटा होकर ये ऊंधे काम मत करो, कोई ऐसा व्यापार करो जिसमें पैसे आएं।” कुछ लोगों ने सहयोग किया, लेकिन कई बार उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा। फिर भी उन्होंने अपने संकल्प से समझौता नहीं किया। उन्हें विश्वास था कि धन से बड़ा मूल्य समाज के लिए छोड़ी गई विरासत का होता है।समय ने भी यही सिद्ध किया। जिन लोगों ने केवल संपत्ति अर्जित की, वे समय के साथ गुमनाम हो गए। लेकिन सुबोध कुमार अग्रवाल और गोविंद अग्रवाल अपने पीछे एक संस्था, एक संग्रहालय, अनेक पुस्तकें, शोध सामग्री और प्रेरणादायी सांस्कृतिक आंदोलन छोड़ गए। यही उनकी वास्तविक पूंजी और अमर पहचान है।मुझे भी उनके सान्निध्य का सौभाग्य मिला। जब मैं बीए की पढ़ाई के लिए चूरू आया, तभी उनसे परिचय हुआ, जो उनके जीवन के अंतिम समय तक बना रहा। मेरे गांव भाड़ंग में आयोजित कार्यक्रम में भी उन्होंने स्नेहपूर्वक सहभागिता की। नगरश्री के प्रत्येक आयोजन में उन्होंने सदैव प्रोत्साहन और सम्मान दिया। उनका सरल स्वभाव, विद्वता, आत्मीय व्यवहार और संस्कृति के प्रति समर्पण आज भी स्मृतियों में जीवंत है।आज, उनके 18वें स्मृति दिवस पर उन्हें याद करते हुए यह सहज ही महसूस होता है कि व्यक्ति की महानता उसकी संपत्ति से नहीं, बल्कि समाज को दिए गए योगदान से आंकी जाती है। सुबोध कुमार अग्रवाल ने अपने जीवन से यह सिद्ध कर दिया कि यश, सेवा और संस्कृति की साधना ही मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है।उनकी स्मृतियां, उनके कार्य और उनके द्वारा स्थापित नगरश्री आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देते रहेंगे कि इतिहास और संस्कृति की रक्षा करने वाले लोग कभी नहीं मरते, वे अपने कार्यों में सदैव जीवित रहते हैं।
स्वर्गीय सुबोध कुमार अग्रवाल जी के 18वें स्मृति दिवस पर उन्हें शत-शत नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि। 💐










