9 वर्ष बाद मिला न्याय का सहारा, 85 हजार शास्ति व 1.50 लाख क्षतिपूर्ति के आदेश
झुंझुनूं।अजीत जांगिड़
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, झुंझुनूं ने सहकार जीवन सुरक्षा बीमा योजना में गंभीर लापरवाही के एक मामले में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए अहम फैसला सुनाया है। आयोग ने बीमा प्रीमियम राशि वसूलने के बावजूद 395 ग्रामीण बीमित सदस्यों के नाम मास्टर पॉलिसी में शामिल नहीं किए जाने को गंभीर अनियमितता एवं अनुचित व्यापार व्यवहार करार दिया है। आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेन्द्र कुमार सैनी ने सजना देवी बनाम एलआईसी एवं अन्य प्रकरण में निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि ग्राम सेवा सहकारी समिति चुड़ैला के सदस्यों से सहकार जीवन सुरक्षा योजना के अंतर्गत प्रीमियम तो वसूला गया, लेकिन बीमा रिकॉर्ड में उनके नाम दर्ज ही नहीं किए गए, जो बीमा व्यवस्था की गंभीर चूक को दर्शाता है।प्रकरण के अनुसार चुड़ैला ग्राम सेवा सहकारी समिति के 395 सदस्यों से सहकार जीवन सुरक्षा योजना के तहत कुल 5,54,275 रुपए की बीमा प्रीमियम राशि वसूल कर केंद्रीय सहकारी बैंक के माध्यम से एलआईसी को प्रेषित की गई थी। प्रीमियम राशि प्राप्त होने के बाद मास्टर पॉलिसी भी जारी कर दी गई, लेकिन उसमें बीमित सदस्यों के नाम शामिल नहीं किए गए। यह मामला तब उजागर हुआ जब परिवादिया सजना देवी के पति श्योराम की 17 फरवरी 2013 को मृत्यु हो गई। श्योराम ने सहकारी समिति के माध्यम से ऋण लिया था तथा बीमा प्रीमियम भी जमा कराया गया था। मृत्यु के बाद बीमा क्लेम प्रस्तुत किए जाने पर लंबे समय तक जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टाली जाती रही, जिससे पीड़िता को लगभग 9 वर्ष 4 माह तक न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ा। आयोग ने अपने निर्णय में कहा कि ग्रामीण एवं सहकारी क्षेत्र के उपभोक्ताओं से बीमा प्रीमियम तो समय पर वसूल लिया जाता है, लेकिन क्लेम भुगतान के समय उन्हें अनावश्यक परेशानियों और लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है, जो उपभोक्ता संरक्षण कानून की भावना के विपरीत है। आयोग ने कहा कि बीमा कंपनियों से केवल लाभ की नहीं, बल्कि उपभोक्ता हितों की रक्षा की अपेक्षा भी की जाती है। निर्णय में आयोग ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि त्वरित न्याय की भावना को मजबूत करने के लिए अधिनियम को समय-समय पर और प्रभावी बनाया गया, फिर भी इस प्रकरण में वर्षों तक न्याय में देरी गंभीर चिंता का विषय है। आयोग ने मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए राष्ट्रीय लोक अदालत की पवित्र भावना की पालना नहीं करने पर एलआईसी पर 85 हजार रुपए की शास्ति (जुर्माना) लगाने के आदेश दिए हैं। साथ ही मानसिक संताप के लिए विशेष क्षतिपूर्ति के रूप में 1.50 लाख रुपए पीड़िता को देने का आदेश भी न्यायोचित माना गया है। आयोग ने आदेश की प्रति राज्य सरकार के मुख्य सचिव को भेजते हुए ग्राम सेवा सहकारी समितियों से जुड़ी बीमा योजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने की अनुशंसा की है। साथ ही आयोग अध्यक्ष ने जिला अभिभाषक संस्था के अधिवक्ताओं से उपभोक्ता संरक्षण की भावना को मजबूत करने हेतु सहयोग का आह्वान करते हुए वर्ष में कम से कम एक मामले में निःशुल्क पैरवी करने की अपील भी की है।
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