138 डिग्रियां, 11 वर्ल्ड रिकॉर्ड… झुंझुनूं का पूर्व सैनिक “डॉ. दशरथ सिंह शेखावत ” बने ‘दुनिया के सबसे ज्यादा शिक्षित शख्स’

खिरोड़ के किसान परिवार से उठकर रचा इतिहास तीन पीढ़ियां फौज में, कारगिल के मोर्चे से किताबों तक का सफर , 2500 सैनिकों की कानूनी लड़ाई लड़कर बने मिसाल

पिलानी । झुंझुनूं ।अजीत जांगिड़
जिले के नवलगढ़ तहसील के छोटे से गांव खिरोड़ से निकलकर एक पूर्व सैनिक ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है, जिसने पूरे देश ही नहीं बल्कि दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। डॉ. दशरथ सिंह शेखावत आज “मोस्ट एजुकेशनली क्वालिफाइड पर्सन ऑफ द वर्ल्ड” के खिताब से नवाजे जा चुके हैं। उनके नाम 138 डिग्रियां, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट दर्ज हैं, साथ ही वे 11 अंतरराष्ट्रीय वर्ल्ड रिकॉर्ड भी अपने नाम कर चुके हैं। हाल ही में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के 39वें दीक्षांत समारोह में उन्हें वैदिक अध्ययन में परास्नातक की 138वीं डिग्री डिस्टिंक्शन के साथ प्रदान की गई—जो उनके अद्भुत शैक्षणिक सफर का नया पड़ाव है। डॉ दशरथ सिंह को 15 जनवरी 2026 सेना दिवस के विशेष अवसर पर ” वेटरन्स अचीवर अवॉर्ड 2026 ” से भारतीय थल सेना के अध्यक्ष जनरल उपेन्द्र द्विवेदी द्वारा सम्मानित किया गया वहीं 7 अप्रैल 2026 को एआईसीटीई इनोवेशन सेंटर, जयपुर में आयोजित हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्व विद्यालय के 39 वें दीक्षांत समारोह में भारत के शिक्षा रत्न सैनिक डॉ दशरथ सिंह को 138 वीं शैक्षणिक डिग्री के रूप में वैदिक स्ट्डीज में एम. ए . विशेष योग्यता के साथ राजस्थान के उप मुख्यमंत्री एवं उच्च शिक्षा मंत्री डॉ प्रेमचंद बैरवा ने प्रदान कर सम्मानित किया I

तीन पीढ़ियों की देशभक्ति, तीसरी पीढ़ी ने बनाया इतिहास

डॉ. शेखावत एक ऐसे परिवार से आते हैं जहां देशसेवा परंपरा रही है। उनके दादा बाघ सिंह और पिता रघुवीर सिंह शेखावत भी सेना में रह चुके हैं। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने 1988 में भारतीय सेना की 9वीं राजपूत इन्फेंट्री बटालियन में सिपाही के रूप में भर्ती होकर देश की सेवा की।

कारगिल के रण से क्लासरूम तक… जुनून नहीं टूटा

पंजाब, असम (उल्फा आंदोलन) और जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील इलाकों में तैनाती के दौरान भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। वे कारगिल युद्ध का हिस्सा भी रहे, लेकिन मोर्चे की कठिन परिस्थितियां भी उनके जज्बे को रोक नहीं सकीं। डॉ. शेखावत बताते हैं कि वे साल में मिलने वाली दो महीने की छुट्टियां केवल परीक्षा देने के लिए लेते थे—न होली, न दिवाली… सिर्फ पढ़ाई I गरीबी से जंग, खेत की सब्जियां बेचकर भरी फीस । उनका बचपन अभावों में बीता। परिवार में कोई पढ़ा-लिखा नहीं था और आर्थिक हालात इतने कमजोर थे कि कॉलेज फीस के लिए खेतों की सब्जियां मंडी में बेचनी पड़ती थीं। एक समय ऐसा भी आया जब फीस न भर पाने के कारण उनका नाम कॉलेज से काट दिया गया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

डिग्रियों का ‘अद्भुत खजाना’

डॉ. शेखावत के पास शिक्षा का ऐसा भंडार है जो अपने आप में रिकॉर्ड है जिनमें — 03 पीएचडी (तीन अलग-अलग विषयों में) , 46 पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रियां, 07 ग्रेजुएशन डिग्रियां , 23 डिप्लोमा , 07 सैन्य डिग्रियां और 52 सर्टिफिकेट शामिल हैं I
उन्होंने एलएलबी, एलएलएम, बीजेएमसी और बीएड जैसी डिग्रियां नियमित छात्र के रूप में हासिल कीं, जबकि कई अन्य डिग्रियां दूरस्थ शिक्षा से प्राप्त कीं।

11 वर्ल्ड रिकॉर्ड… दुनिया ने माना लोहा

डॉ. शेखावत के नाम हॉवर्ड, एशिया, लंदन और यूएसए सहित कई प्रतिष्ठित बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में कुल 11 वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज हैं।

अब सैनिकों के हक की लड़ाई

2004 में सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई को समाज सेवा का माध्यम बनाया। वर्तमान में वे रक्षा मंत्रालय और सेना की सप्त शक्ति कमांड (जयपुर) में सीनियर विधि सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं। अब तक वे 2500 से अधिक पूर्व सैनिकों और जवानों के कानूनी मामलों की पैरवी कर चुके हैं—जिनमें अधिकांश में सफलता हासिल हुई है। झुंझुनूं जिले के खिरोड़ गांव के इस सपूत की कहानी सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि संघर्ष, अनुशासन और अटूट संकल्प की मिसाल है। सेना की वर्दी से लेकर शिक्षा के शिखर तक पहुंचने का उनका सफर हर युवा के लिए यह संदेश देता है— “हालात नहीं, हौसले इतिहास लिखते हैं।”