चिड़ावा न्यायिक मजिस्ट्रेट का बड़ा आदेश, चिड़ावा तहसीलदार और गिरदावर पर केस दर्ज

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अमरपुरा में मकान, बाड़ा और फसल तोड़ने के मामले में कोर्ट सख्त, आदेश में लिखा— डीएसपी स्तर के अधिकारी करेंगे जांच

सुलताना । झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
चिड़ावा स्थित न्यायिक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने प्रशासनिक कार्रवाई पर सख्त रुख अपनाते हुए चिड़ावा तहसीलदार रामकुमार पूनियां और सुलताना गिरदावर अरूण सिंह के खिलाफ विभिन्न गंभीर धाराओं में केस दर्ज करने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने मामले की जांच डीएसपी स्तर के अधिकारी से कराने के आदेश भी पुलिस को दिए हैं। मामला करीब तीन महीने पहले का, पिछले वर्ष 18 दिसंबर 2025 का है। जिस दिन श्रीअमरपुरा गांव में हाईकोर्ट और चिड़ावा तहसीलदार न्यायालय के एक पुराने बेदखली आदेश का हवाला देते हुए अधिवक्ता सचिन धनखड़ की खुद की जमीन को ही सरकारी जमीन बताते हुए प्रशासनिक कार्रवाई कर दी थी। आरोप है कि इस कार्रवाई के दौरान युवा अधिवक्ता सचिन धनखड़ के दो मकान, पशुओं का कच्चा बाड़ा और खेत में खड़ी फसल को अतिक्रमण मानते हुए नष्ट कर दिया गया। बताया गया कि कार्रवाई के दौरान अधिवक्ता सचिन धनखड़ ने इसका विरोध किया। लेकिन मौके पर मौजूद पुलिस बल ने उन्हें हटाकर कार्रवाई जारी रखी। ट्रेक्टर के जरिए फसल को नष्ट किया गया। जेसीबी के जरिए पक्का निर्माण तोड़ा गया। इसके बाद सचिन धनखड़ ने पुलिस थाने में शिकायत देकर एफआईआर दर्ज करवाने की कोशिश की। लेकिन पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया। अब कोर्ट में परिवाद दायर होने के बाद दोनों पक्षों के तर्क सुनने के बाद अदालत ने सुलताना थाने में एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं। मामले की जांच चिड़ावा डीएसपी विकास धींधवाल को सौंपी गई है। परिवादी की ओर से दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि पहले अतिक्रमण को लेकर जो नोटिस दिया गया था। उसमें केवल जमीन के किनारे बने बाड़ और डोले का उल्लेख था। जिन्हें हटा दिया गया था। लेकिन बाद में की गई कार्रवाई में बिना किसी नए नोटिस के दो कमरे, पशुओं का बाड़ा और फसल को भी नष्ट कर दिया गया। जबकि यह सब उनकी पैतृक जमीन में बना हुआ था। परिवादी ने यह भी आरोप लगाया है कि कार्रवाई के दौरान बार-बार बताने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी की गई। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसी पक्के निर्माण को ध्वस्त करने से कम से कम 15 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य होता है। जबकि इस मामले में ऐसा कोई नोटिस जारी नहीं किया गया। कोर्ट के इस आदेश के बाद प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है और मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

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