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झुंझुनूं में ओला की सियासी चाल कामयाब, भांबू की बिसात उलझी

झुंझुनूं नगर परिषद चुनाव परिणाम में कांग्रेस भाजपा और निर्दलीयों का सियासी समीकरण

नगर परिषद में कांग्रेस की वापसी ने खोला रणनीति से लेकर टिकट वितरण तक का हिसाब; 60 में 30 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी ताकत, भाजपा 15 पर सिमटी—अब निर्दलीयों पर सत्ता की चाबी

झुंझुनूं। अजीत जांगिड़
झुंझुनूं नगर परिषद चुनाव का परिणाम केवल 60 वार्डों में किस पार्टी ने कितनी सीटें जीतीं, इसका आंकड़ा नहीं है। यह परिणाम शहर की राजनीति में किसकी रणनीति चली, किसका संगठन जमीन पर उतरा और टिकट वितरण का फायदा किसे मिला, इसका भी सियासी रिपोर्ट कार्ड बनकर सामने आया है। कांग्रेस ने 30 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में वापसी की है, जबकि भाजपा 15 और निर्दलीय भी 15 सीटों पर रहे। बहुमत के लिए जरूरी 31 के आंकड़े से कांग्रेस सिर्फ एक सीट दूर है। इस परिणाम ने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा किया है—क्या सांसद बृजेंद्र सिंह ओला की चुनावी रणनीति और स्थानीय सियासी चाल भाजपा विधायक राजेंद्र भांबू की रणनीति पर भारी पड़ी? आंकड़े फिलहाल कांग्रेस के पक्ष में इस सवाल का जवाब देते दिखाई दे रहे हैं।

ओला की रणनीति को मिली धार, कांग्रेस ने वापस हासिल किया शहर

कांग्रेस का 30 सीटों तक पहुंचना महज एक चुनावी उपलब्धि नहीं माना जा रहा। पिछले कुछ समय से शहर की राजनीति में कांग्रेस के सामने संगठन को एकजुट रखने और स्थानीय स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने की चुनौती थी। चुनाव परिणाम में कांग्रेस का सबसे बड़ा दल बनकर उभरना बताता है कि ओला खेमे ने वार्ड स्तर के समीकरणों को साधने में अपेक्षाकृत बेहतर राजनीतिक प्रबंधन किया। स्थानीय राजनीति में उम्मीदवार का व्यक्तिगत प्रभाव, सामाजिक समीकरण, पुराने संपर्क और वार्ड स्तर की सक्रियता हमेशा निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इस चुनाव में भी यही दिखाई दिया। कांग्रेस ने जहां अपने कई पुराने चेहरों पर भरोसा बनाए रखा, वहीं स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले चेहरों को भी मैदान में उतारा। नतीजा—कांग्रेस 30 तक पहुंची और सत्ता की दहलीज पर खड़ी हो गई।

भांबू की सियासी बिसात में कहां चूकी भाजपा?

भाजपा के लिए चुनाव परिणाम को दो नजरिए से देखा जा सकता है। एक तरफ पार्टी ने 2019 के 10 के मुकाबले इस बार 15 सीटें जीतकर पांच सीटों का इजाफा किया है, लेकिन दूसरी तरफ नगर परिषद की सत्ता हासिल करने के लिहाज से यह संख्या पर्याप्त नहीं रही। राजनीतिक जानकारों के बीच चर्चा का विषय यही है कि क्या भाजपा की टिकट रणनीति और संगठनात्मक मशीनरी एक-दूसरे के साथ पूरी तरह तालमेल में काम कर पाई? चुनाव परिणाम के बाद पार्टी के भीतर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि टिकट वितरण के दौरान क्या हर वार्ड की जमीनी नब्ज को पर्याप्त महत्व दिया गया? क्या लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे मूल जमीनी कार्यकर्ताओं को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस मिला? और क्या उम्मीदवार चयन में सामाजिक समीकरणों के साथ-साथ उनकी व्यक्तिगत वार्ड पकड़ का सही आकलन हुआ? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चुनाव में सरकार की ताकत से ज्यादा मायने वार्ड की गली तक संगठन की पहुंच रखती है। ऐसे में राज्य और केंद्र में भाजपा की सरकार होने के बावजूद झुंझुनूं नगर परिषद में भाजपा का बोर्ड नहीं बन पाना पार्टी के लिए संगठनात्मक समीक्षा का बड़ा विषय है।

सरकार भाजपा की, लेकिन शहर की सत्ता कांग्रेस के करीब

इस चुनाव का यह विरोधाभास भी खासा दिलचस्प है कि प्रदेश और केंद्र में भाजपा की सरकार होने के बावजूद झुंझुनूं नगर परिषद में कांग्रेस सत्ता के सबसे करीब पहुंच गई है। इसका सीधा मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि शहर ने सरकार के खिलाफ मतदान किया, लेकिन यह जरूर संकेत देता है कि स्थानीय निकाय चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, व्यक्तिगत छवि, वार्ड समीकरण और स्थानीय नेतृत्व ने पार्टी की सत्ता से अधिक प्रभाव डाला। यही वह बिंदु है जहां भाजपा की चुनावी रणनीति और कांग्रेस के स्थानीय राजनीतिक प्रबंधन की तुलना शुरू होती है।

टिकट ने तय की आधी लड़ाई?

चुनाव परिणाम के बाद टिकट वितरण सबसे ज्यादा चर्चा वाला विषय बन गया है। कांग्रेस के पक्ष में यह बात गई कि उसके कई उम्मीदवारों ने पार्टी संगठन के साथ-साथ अपने व्यक्तिगत नेटवर्क का भी फायदा उठाया। वहीं भाजपा में टिकट को लेकर कुछ जगहों पर असंतोष और जमीनी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं की अनदेखी की चर्चाएं चुनाव के दौरान भी सुनाई देती रहीं। हालांकि इन चर्चाओं को सीधे हार का कारण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन 15 बनाम 30 का अंतर इतना बड़ा है कि भाजपा संगठन को वार्डवार परिणामों का विश्लेषण कर यह देखना होगा कि कहां उम्मीदवार चयन, स्थानीय नाराजगी अथवा संगठनात्मक तालमेल कमजोर रहा।

निर्दलीयों ने बनाया पूरा खेल रोमांचक

कांग्रेस के 30 और भाजपा के 15 के बीच 15 निर्दलीयों की मौजूदगी ने नगर परिषद की राजनीति को पूरी तरह रोचक बना दिया है। खास तौर पर पूर्व उपसभापति वीरेंद्र डारा की जीत महत्वपूर्ण है।डारा वार्ड 9 से निर्दलीय जीते हैं और चुनाव से पहले कांग्रेस के समर्थन में रहने की बात कह चुके हैं। यदि उनका समर्थन कांग्रेस को मिलता है तो कांग्रेस का आंकड़ा 30 से बढ़कर 31 हो जाएगा और बहुमत का जादुई आंकड़ा पूरा हो जाएगा। यानी चुनाव परिणाम के बाद मुकाबला भले ही कांग्रेस बनाम भाजपा दिख रहा हो, लेकिन बोर्ड गठन की पटकथा में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो गई है।

सभापति की कुर्सी पर भी शुरू हुआ सियासी मंथन

अब कांग्रेस खेमे में अगली बड़ी चुनौती बोर्ड बनाना ही नहीं, बल्कि सभापति पद के लिए सहमति बनाना भी होगी। राजनीतिक हलकों में वीरेंद्र डारा के साथ मुस्लिम चेहरों में अब्दुल्ला अगवान, शहर ब्लॉक अध्यक्ष अजमत अली, उमर कुरैशी, जुल्फीकार अली खोखर और पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष तैयब अली जैसे नामों की चर्चा है। हालांकि सभापति पद का अंतिम समीकरण पार्टी नेतृत्व, पार्षदों की संख्या, आरक्षण और निर्वाचित सदस्यों के समर्थन से तय होगा। इसलिए फिलहाल किसी एक नाम को अंतिम दावेदार मानना जल्दबाजी होगी।

ओला के लिए राजनीतिक संदेश, भांबू के लिए आत्ममंथन का मौका

नगर परिषद चुनाव का परिणाम सांसद बृजेंद्र सिंह ओला के लिए स्थानीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस का 30 सीटों तक पहुंचना यह संकेत देता है कि ओला खेमे की राजनीतिक रणनीति, उम्मीदवारों का चयन और वार्ड स्तर का प्रबंधन इस चुनाव में प्रभावी रहा। इसके उलट भाजपा विधायक राजेंद्र भांबू के लिए 15 सीटों का परिणाम आत्ममंथन का अवसर है। पार्टी की सीटें बढ़ी हैं, लेकिन कांग्रेस से 15 सीट पीछे रह जाना बताता है कि संगठन की ताकत को चुनावी परिणाम में बदलने के लिए अभी और बेहतर वार्ड प्रबंधन की जरूरत है।

60 वार्डों का फैसला सिर्फ बोर्ड नहीं, दोनों नेताओं का रिपोर्ट कार्ड भी

इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि अब 60 वार्डों का परिणाम ओला बनाम भांबू की स्थानीय राजनीतिक प्रभावशीलता के पैमाने पर भी पढ़ा जाएगा। कांग्रेस के 30, भाजपा के 15 और निर्दलीयों के 15—ये तीन आंकड़े आने वाले दिनों में झुंझुनूं की राजनीति की दिशा तय करेंगे। एक तरफ कांग्रेस बहुमत से केवल एक कदम दूर है, दूसरी तरफ भाजपा के सामने यह सवाल है कि सत्ता की अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद नगर परिषद में अपेक्षित बढ़त क्यों नहीं मिली?

सबसे बड़ा सवाल—क्या ओला की रणनीति सचमुच भांबू की सियासी बिसात पर भारी पड़ी?

फिलहाल चुनावी आंकड़े कांग्रेस के पक्ष में हैं। लेकिन नगर परिषद की असली बाजी बोर्ड गठन और सभापति चुनाव में खुलेगी। यही वह चरण होगा, जहां 30 सीटों वाली कांग्रेस की रणनीति, 15 सीटों वाली भाजपा की राजनीतिक सक्रियता और 15 निर्दलीयों की सौदेबाजी—तीनों की असली परीक्षा होगी।

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