जिम्मेदारों की गैरहाजिरी ने खोली सिस्टम की पोल] इजाजुद्दीन शाह को आंशिक राहत, राजस्थान सरकार से लेकर स्थानीय प्रशासन तक बने पक्षकार—वक्फ अधिकरण ने दिए रिकॉर्ड सुधार के स्पष्ट निर्देश
झुंझुनूं । अजीत जांगिड
करीब दो दशक पुराने वक्फ संपत्ति विवाद में राजस्थान वक्फ अधिकरण, जयपुर ने अहम फैसला सुनाते हुए प्रशासनिक लापरवाही, रिकॉर्ड प्रबंधन की खामियों और जवाबदेही की कमी को उजागर कर दिया है। वाद संख्या 60/2004 में वादी इजाजुद्दीन शाह पुत्र फजल नबी, निवासी झुंझुनूं (आयु लगभग 40 वर्ष, राजदानासीन मुतवल्ली) की ओर से दायर मुकदमे में अधिकरण ने आंशिक रूप से वादी के पक्ष में निर्णय देते हुए संबंधित विभागों को रिकॉर्ड दुरुस्ती और आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह फैसला ऐसे समय आया है जब वक्फ संपत्तियों के संरक्षण और पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इस मामले ने यह भी दिखाया कि लंबे समय तक विवाद लंबित रहने के पीछे प्रशासनिक उदासीनता किस तरह बड़ी वजह बनती है।वादी और प्रतिवादी—पूरा पक्ष स्पष्ट I इस महत्वपूर्ण मामले में वादी: इजाजुद्दीन शाह पुत्र फजल नबी, निवासी झुंझुनूं तथा प्रतिवादीगण: राजस्थान सरकार, मुख्य सचिव, जयपुर , जिला कलेक्टर, झुंझुनूं , तहसीलदार, तहसील झुंझुनूं , अधिशासी अधिकारी, नगर पालिका झुंझुनूं , मुख्य वन संरक्षक राजस्थान, जयपुर , राजस्थान बोर्ड ऑफ मुस्लिम वक्फ, जयपुर।
सुनवाई में खुली लापरवाही की परतें
अधिकरण के समक्ष सुनवाई के दौरान जो स्थिति सामने आई, उसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए।प्रतिवादी संख्या 1 (राजस्थान सरकार), 2 (जिला कलेक्टर झुंझुनूं ), 3 (तहसीलदार झुंझुनूं ) और 5 (वन विभाग) की ओर से कोई भी प्रतिनिधि या अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुआ। इतने अहम मामले में उच्च स्तर के अधिकारियों की गैरहाजिरी ने यह संकेत दिया कि या तो मामले को गंभीरता से नहीं लिया गया या फिर जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति हावी रही। वहीं— प्रतिवादी संख्या 4 (नगर पालिका) की ओर से अधिवक्ता अनिल तिवाड़ी प्रतिवादी संख्या 6 (वक्फ बोर्ड) की ओर से अधिवक्ता प्रह्लाद गुप्ता उपस्थित रहे। वादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता अमानुल्लाह खान (मुंबई) ने पैरवी की।मामले की सुनवाई अधिकरण सदस्य शमीम अहमद कुरैशी द्वारा की गई।
क्या था विवाद—रिकॉर्ड में गड़बड़ी बनी जड़
मामला वक्फ संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड, कब्जे और प्रविष्टियों में कथित गड़बड़ी से जुड़ा था। वादी इजाजुद्दीन शाह ने अधिकरण में याचिका दायर कर— रिकॉर्ड दुरुस्ती , स्थायी निषेधाज्ञा , बेदखली की मांग की थी। सुनवाई के दौरान प्रस्तुत दस्तावेजों और साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि संबंधित रिकॉर्ड में विसंगतियां मौजूद हैं और वर्षों तक इन पर प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। यही लापरवाही विवाद के लंबे समय तक खिंचने की प्रमुख वजह बनी।
अधिकरण का आदेश—आंशिक राहत, सख्त निर्देश
विस्तृत सुनवाई के बाद अधिकरण ने वादी के पक्ष में आंशिक रूप से वाद स्वीकार किया। संबंधित विभागों को रिकॉर्ड सुधार (दुरुस्ती) के निर्देश दिए ॥ वक्फ संपत्ति से जुड़े मामलों में स्थायी निषेधाज्ञा के संबंध में आदेश पारित किया I अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि वक्फ संपत्तियों के मामलों में लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदारी निभानी होगी।आदेश में मुकदमे से जुड़े खर्चों का भी उल्लेख किया गया है। इससे साफ है कि मामला वर्षों तक लंबित रहने के कारण पक्षकारों को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह का नुकसान उठाना पड़ा। करीब 20 साल तक चले इस विवाद ने यह भी दिखाया कि समय पर कार्रवाई न होने से छोटे विवाद भी बड़े और जटिल बन जाते हैं।
प्रशासनिक तंत्र पर बड़ा सवाल
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि जब न्यायालय में सुनवाई के दौरान ही जिम्मेदार अधिकारी उपस्थित नहीं होते, तो आम मामलों में जवाबदेही कैसे तय होती होगी? रिकॉर्ड में गड़बड़ी, कार्रवाई में देरी और न्यायालय में अनुपस्थिति, ये सभी संकेत देते हैं कि प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार की तत्काल जरूरत है।राजस्थान वक्फ अधिकरण का यह फैसला केवल एक विवाद का निपटारा नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए चेतावनी है।यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई और रिकॉर्ड प्रबंधन को दुरुस्त नहीं किया गया, तो ऐसे विवाद आगे भी सामने आते रहेंगे और शासन-प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठते रहेंगे।
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