“अन्य समाजों के बोर्ड सक्रिय, फिर विप्र समाज उपेक्षित क्यों?” — महेश बसावातिया

“विप्र कल्याण बोर्ड पर सरकार की चुप्पी क्यों?” — पुनर्गठन की मांग ने पकड़ा सियासी तूल

झुंझुनूं। अजीत जांगिड़
राज्य की राजनीति में एक बार फिर विप्र कल्याण बोर्ड का मुद्दा गरमा गया है। विप्र सेना के प्रदेश वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेश बसावातिया ने राज्य सरकार पर सीधा दबाव बनाते हुए बोर्ड के पुनर्गठन की जोरदार मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि जब अन्य जातियों के कल्याण बोर्डों का पुनर्गठन किया जा चुका है, तो विप्र समाज के हितों की अनदेखी आखिर क्यों की जा रही है?
बसावातिया ने मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि यह केवल एक बोर्ड का गठन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, शैक्षणिक और परंपरागत ज्ञान के संरक्षण का प्रश्न है।

“सिर्फ कागजों में सिमट गया बोर्ड”

पूर्व सरकार पर भी निशाना – बसावातिया ने पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार पर भी हमला बोलते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में विप्र कल्याण बोर्ड का गठन तो हुआ, लेकिन वह जमीनी स्तर पर प्रभावी नहीं हो सका और महज कागजी औपचारिकता बनकर रह गया। उन्होंने आरोप लगाया कि बोर्ड का उद्देश्य समाज के हितों की रक्षा और उन्नति करना था, लेकिन ठोस योजनाओं और क्रियान्वयन के अभाव में इसका लाभ समाज तक नहीं पहुंच पाया। बसावातिया ने अपने बयान में कहा कि यदि सनातन परंपरा को अक्षुण्ण रखना है तो ब्राह्मण समाज द्वारा संरक्षित ज्ञान—जैसे वास्तु शास्त्र, ज्योतिष और आयुर्वेद—को संस्थागत समर्थन देना जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विप्र कल्याण बोर्ड एक बहुआयामी निकाय के रूप में इन पारंपरिक विद्याओं के संरक्षण और शोध का केंद्र बन सकता है, जिससे समाज के साथ-साथ राज्य को भी दीर्घकालिक लाभ होगा।

“समर्पित नेतृत्व को सौंपी जाए जिम्मेदारी”

बसावतिया ने सरकार से मांग की कि बोर्ड का नेतृत्व ऐसे व्यक्ति को सौंपा जाए जो विप्र समाज के प्रति समर्पित हो और समाज के हितों को सर्वोपरि रखे। उनका कहना है कि मजबूत और सक्रिय नेतृत्व ही बोर्ड को प्रभावी और परिणामोन्मुख बना सकता है।

राजनीतिक संदेश: समाज की अनदेखी पड़ेगी भारी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले समय में सामाजिक संतुलन और राजनीतिक समीकरण दोनों को प्रभावित कर सकता है। यदि सरकार ने इस मांग पर जल्द संज्ञान नहीं लिया, तो यह विषय व्यापक जनसमर्थन जुटाकर बड़ा जनआंदोलन बन सकता है। अब नजरें राज्य सरकार पर टिकी हैं—क्या मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा इस संवेदनशील मुद्दे पर त्वरित निर्णय लेकर विप्र समाज की अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे, या फिर यह मुद्दा राजनीतिक असंतोष का नया केंद्र बनेगा?
विप्र कल्याण बोर्ड का पुनर्गठन अब सिर्फ एक प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। आने वाले दिनों में सरकार की प्रतिक्रिया तय करेगी कि यह मुद्दा समाधान की ओर बढ़ेगा या सियासी संघर्ष का नया मोर्चा खोलेगा।