अंक, उपस्थिति और ईमानदारी का संकट, विश्वविद्यालयों में मूल्यांकन पर उठते सवाल

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झुंझुनूं ।अजीत जांगिड़
हाल ही में हरियाणा की चौधरी रणवीर सिंह विश्वविद्यालय से जुड़ा एक कथित मार्किंग घोटाला सामने आया है। जिसमें आरोप है कि जिन विद्यार्थियों की कक्षाओं में उपस्थिति कम थी। उन्हें अपेक्षाकृत अधिक अंक दिए गए। जबकि नियमित रूप से पढ़ाई करने वाले छात्रों को कम अंक मिले। इस मामले में चार प्रोफेसरों के खिलाफ धोखाधड़ी का केस दर्ज होना यह दर्शाता है कि मामला केवल प्रशासनिक त्रुटि का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की नैतिकता और विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन चुका है। यह घटना केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश के कई निजी और राज्य विश्वविद्यालयों से भी ऐसी अनियमितताओं की खबरें सामने आती रही हैं। राजस्थान श्री जगदीशप्रसाद झाबरमल टीबड़ेवाला यूनिवर्सिटी, मेवाड़ यूनिवर्सिटी, ओपीजीएस विश्वविद्यालय, सनराइज यूनिवर्सिटी सहित कुल 10 यूनिवर्सिटी का नाम बैक डेट, बिना पढ़ाई डिग्री देने, मूल्यांकन प्रक्रिया को प्रभावित कर डिग्री जारी करने और फर्जीवाड़ा करने जैसे विवादों में चर्चा में रहा है। इन घटनाओं ने एक व्यापक प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे विश्वविद्यालय वास्तव में ज्ञान और योग्यता के केंद्र बने हुए हैं, या वे धीरे-धीरे केवल डिग्री वितरण के संस्थान बनते जा रहे हैं?

शिक्षा का आधार, निष्पक्ष मूल्यांकन

किसी भी शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता का मूल आधार निष्पक्ष और पारदर्शी मूल्यांकन होता है। परीक्षा में प्राप्त अंक केवल एक संख्या नहीं होते। वे छात्र के परिश्रम, अनुशासन और सीखने की प्रक्रिया का प्रमाण होते हैं। यदि अंक देने की प्रक्रिया में पक्षपात, लापरवाही या जानबूझकर की गई अनियमितता शामिल हो जाए, तो पूरा शैक्षणिक ढांचा ही संदिग्ध हो जाता है। चौधरी रणवीर सिंह विश्वविद्यालय के मामले में कम उपस्थिति वाले छात्रों को अधिक अंक मिलने का आरोप यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं मूल्यांकन की प्रणाली में गंभीर खामियां मौजूद हैं। यह स्थिति उन छात्रों के साथ अन्याय है जो नियमित रूप से कक्षाओं में उपस्थित रहते हैं, मेहनत से पढ़ाई करते हैं और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक प्रक्रिया का ईमानदारी से पालन करते हैं।

विश्वविद्यालयों की साख पर संकट

विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते। वे समाज के बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व के केंद्र होते हैं। जब विश्वविद्यालयों से जुड़े शिक्षक या अधिकारी ही अनियमितताओं के आरोपों में घिर जाते हैं। तो इससे संस्थान की प्रतिष्ठा को गहरी क्षति पहुंचती है। राजस्थान के कुछ निजी विश्वविद्यालयों के संदर्भ में समय-समय पर उठे विवादों ने भी यही प्रश्न उठाया है कि क्या उच्च शिक्षा संस्थानों की निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था पर्याप्त रूप से मजबूत है। ओपीजीएस, जेजेटीयू चुड़ैला, सनराइज और अब चौधरी रणवीर सिंह जैसे विश्वविद्यालय से जुड़े विवादों ने यह संकेत दिया कि यदि नियामक संस्थाओं की निगरानी कमजोर हो। तो शिक्षा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

नियामक तंत्र की भूमिका

भारत में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों की निगरानी के लिए कई नियामक संस्थाएं कार्य करती हैं— जैसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), विभिन्न पेशेवर परिषदें और राज्य सरकारों के उच्च शिक्षा विभाग। इन संस्थाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक मानकों का पालन हो और छात्रों के हित सुरक्षित रहें। लेकिन जब बार-बार अलग-अलग विश्वविद्यालयों से अनियमितताओं की खबरें सामने आती हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या नियामक तंत्र पर्याप्त रूप से सक्रिय और प्रभावी है। निगरानी केवल नियम बनाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे लागू करने और उल्लंघन होने पर कठोर कार्रवाई करने की भी आवश्यकता होती है।

छात्रों के मनोबल पर प्रभाव

ऐसी घटनाओं का सबसे गंभीर प्रभाव छात्रों के मनोबल पर पड़ता है। जो विद्यार्थी ईमानदारी से पढ़ाई करते हैं और नियमों का पालन करते हैं। उनके मन में यह भावना पैदा हो सकती है कि मेहनत का कोई मूल्य नहीं रह गया है। यदि किसी छात्र को यह महसूस होने लगे कि कम उपस्थिति या कम तैयारी के बावजूद भी किसी अन्य माध्यम से अधिक अंक प्राप्त किए जा सकते हैं। तो यह शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही कमजोर कर देता है। इससे शिक्षा का वातावरण प्रतिस्पर्धा और परिश्रम के बजाय शॉर्टकट और अनियमितताओं की ओर झुकने लगता है।

समाधान क्या हो सकते हैं

इस स्थिति से निपटने के लिए केवल दोषियों पर कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। बल्कि शिक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधार भी आवश्यक हैं। सबसे पहले, मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है। डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली, उत्तर पुस्तिकाओं का कोडिंग और डबल-मॉडरेशन जैसे उपाय अनियमितताओं की संभावना को कम कर सकते हैं। दूसरे, विश्वविद्यालयों में नियमित रूप से शैक्षणिक और प्रशासनिक ऑडिट होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप चल रही हैं। तीसरे, नियामक संस्थाओं को शिकायतों और अनियमितताओं पर त्वरित और कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। यदि दोषियों को समय रहते दंडित किया जाए। तो यह अन्य संस्थानों के लिए भी एक चेतावनी का काम करेगा।

शिक्षा की नैतिकता को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता

शिक्षा केवल ज्ञान का प्रसार नहीं है। यह समाज में नैतिकता, ईमानदारी और जिम्मेदारी की भावना को भी विकसित करती है। यदि विश्वविद्यालयों में ही इन मूल्यों का ह्रास होने लगे। तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। चौधरी रणवीर सिंह विश्वविद्यालय में सामने आया कथित मार्किंग घोटाला और अन्य विश्वविद्यालयों से जुड़े विवाद हमें यह याद दिलाते हैं कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए निरंतर सतर्कता और सुधार आवश्यक हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालयों में मूल्यांकन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाया जाए। तभी शिक्षा व्यवस्था मजबूत हो सकती है जब छात्र, शिक्षक और प्रशासन तीनों के बीच विश्वास बना रहे।यदि समय रहते इन समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो भारत के विश्वविद्यालयों की साख और छात्रों के भविष्य दोनों पर इसका दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए यह केवल किसी एक विश्वविद्यालय या राज्य का मुद्दा नहीं है; यह पूरे देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का प्रश्न है और इस प्रश्न का उत्तर केवल कठोर कार्रवाई, पारदर्शिता और नैतिक प्रतिबद्धता के माध्यम से ही दिया जा सकता है।

– डॉ सागर सिंह कछवाह (लेखक शिक्षा सुधार एवं सामाजिक विषयो के स्वतंत्र टिप्पणीकार है।) 

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