विश्व प्रसिद्ध मूर्तिकार नरेश कुमावत देंगे प्रतिमा को भव्य स्वरूप, गौशाला पदाधिकारियों ने गुरुग्राम स्टूडियो का किया दौरा
झुंझुनूं ।अजीत जांगिड़
शेखावाटी की हृदय स्थली झुंझुनूं अब केवल अपनी हवेलियों और वीरता के लिए ही नहीं, बल्कि भक्ति और स्थापत्य कला के एक नए केंद्र के रूप में पहचानी जाएगी। लगभग 125 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक श्री गोपाल गौशाला द्वारा संचालित बगड़ रोड स्थित नंदीशाला में 111 फीट ऊंची भगवान शिव की दिव्य प्रतिमा नंदी महाराज के साथ स्थापित की जाएगी। झुंझुनूं नंदीशाला में 111 फीट ऊंची प्रतिमा लगने के बाद यह स्थान राजस्थान के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्रों में शुमार हो जाएगा। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए गौशाला के पदाधिकारियों ने मानेसर (गुड़गांव) स्थित मातूराम आर्ट गैलरी का दौरा किया और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मूर्तिकार नरेश कुमावत से विस्तृत चर्चा की। श्री गोपाल गौशाला के अध्यक्ष प्रमोद खंडेलिया, मंत्री प्रदीप पाटोदिया एवं डॉ. डीएन तुलस्यान ने नरेश कुमावत के अत्याधुनिक स्टूडियो का अवलोकन किया। बैठक के दौरान प्रतिमा के स्वरूप, निर्माण सामग्री और सुरक्षा मानकों पर चर्चा हुई। गौशाला पदाधिकारियों ने इस अवसर पर पिलानी निवासी और मातूराम वर्मा के सुपुत्र नरेश कुमावत का साफा, दुपट्टा और गौ माता का प्रतीक चिह्न भेंट कर अभिनंदन किया। अध्यक्ष प्रमोद खंडेलिया ने कहा कि हमारा उद्देश्य नंदीशाला को एक रमणीक और आध्यात्मिक स्थल बनाना है। ताकि यहां लोगों का आवागमन बढ़े और समाज में गौ-सेवा के प्रति समर्पण की भावना का और अधिक विकास हो सके।
अंतरराष्ट्रीय मूर्तिकार है नरेश कुमावत
झुंझुनूं के पिलानी में जन्मे नरेश कुमावत आज मूर्तिकला की दुनिया में भारत के सांस्कृतिक राजदूत माने जाते हैं। उनके कार्यों की गूंज भारत से लेकर जेनेवा, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका और जापान शहीद अनेकों देशो तक सुनाई देती है। भारत के नए संसद भवन के अंदर 75 फीट लंबा और 9 फीट ऊंचा समुद्र मंथन भित्तिचित्र नरेश कुमावत की ही कृति है। जिसे बनाने में 235 दिव्य आकृतियों और 40 कारीगरों की मेहनत लगी थी। राजस्थान के नाथद्वारा में स्थापित 369 फीट ऊंची विश्वास स्वरूपम (दुनिया की सबसे ऊंची शिव प्रतिमा) का निर्माण भी कुमावत के मार्गदर्शन में हुआ है। उनकी बनाई महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद और डॉ. बीआर अंबेडकर की प्रतिमाएं 80 से अधिक देशों में स्थापित हैं। वे अपनी मूर्तियों में थ्री डी स्कैनिंग, आईआईटी-समर्थित संरचनात्मक इंजीनियरिंग और लॉस्ट-वैक्स ब्रॉन्ज कास्टिंग जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करते हैं, जो मूर्तियों को सदियों तक सुरक्षित रखती हैं। नरेश कुमावत ने अपनी कला अपने दादा स्वर्गीय हनुमान प्रसाद और पिता मातूराम वर्मा से विरासत में सीखी है। आज वे मातूराम आर्ट सेंटर्स (एमआरएसी) के माध्यम से भारतीय कला को वैश्विक मानकों पर स्थापित कर रहे हैं। इसी के साथ नरेश कुमार की सुपुत्री राशि कुमावत भी इसी कला को जीवंत रखे हुए हैं।अपनी शिक्षा के साथ साथ इस कार्य में भी उन्होंने विशिष्ट उपलब्धि हासिल की है। नरेश कुमावत हरियाणा में एक ग्लोबल क्राफ्ट एंड स्कल्प्टर एक्सीलेंस सेंटर भी चला रहे हैं। जहां नई पीढ़ी को इस महान कला का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
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