सामान्य बच्चों के साथ खेलने जाता था तो लोग कहते थे, यह सिफारिशी क्या भाला फेंकेगा, आज का पद्म भूषण पैरा स्पोर्ट्स के लिए बड़ा दिन

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राजस्थान के देवेंद्र झाझड़िया को राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने दिया पद्म भूषण अवार्ड, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित विभिन्न हस्तियां रहीं मौजूद,पद्म भूषण से सम्मानित होने वाले राजस्थान के पहले खिलाड़ी बने देवेंद्र, देश के इतिहास में यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले पैरा खिलाड़ी

चूरू। देश के महान पैरा ओलंपिक खिलाड़ी, तीन बार के ओलंपिक पदक विजेता, सर्वोच्च खेल पुरस्कार से सम्मानित देवेंद्र झाझड़िया को सोमवार को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में हुए समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित विभिन्न हस्तियां मौजूद रहीं।देवेंद्र देश के खेल इतिहास में पद्म भूषण से सम्मानित होने वाले पहले पैरा खिलाड़ी हैं तथा राजस्थान की ओर से यह सम्मान लेने वाले पहले खिलाड़ी हैं।
सम्मान से अभिभूत देवेंद्र झाझड़िया ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह पद्म भूषण मिलने पर पैरा स्पोर्ट्स में एक उत्साह आएगा और खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी और भारत सरकार के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कहा कि पैरा खिलाड़ियों के लिए ही नहीं, देश के सारे दिव्यांगों के लिए आज बड़ा दिन है। जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टोक्यो पैरा ओलंपिक में जाने से पूर्व मुझसे, मेरे परिवार से और अन्य खिलाड़ियों से बात करके हमें हौसला दिया है, वैसे ही आज के पद्म भूषण से भी खिलाड़ियों और दिव्यांगों को हौसला मिलेगा। आज कोई भी खिलाड़ी सोच सकता है कि वह भी तीन-तीन ओलंपिक पदक जीत सकता है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का सदैव उन पर स्नेह रहा है। जब भी कोई बड़ा इवेंट होता है या कोई उपलब्धि होती है तो उनका फोन आता है और शुभकामनाएं मिलती हैं। उनसे एक पारिवारिक रिश्ता हो गया है।

हाथ कटने पर लोग कहते थे, सब खत्म हो गया है

पद्म भूषण सम्मान पर भावुक हुए देवेंद्र ने बताया कि जब नौ-दस साल की उम्र में करंट लगने से हाथ कट गया और मैं अस्पताल से वापस घर आया तो लोग मेरे मम्मी-पापा से कहते थे कि यह लड़का तो बर्बाद हो गया, साथ ही इसने आपकी जिंदगी भी बर्बाद कर ही। हाथ कटने पर लोग सोचते थे और कहते थे कि यह लड़का कुछ नहीं कर पाएगा, सब खत्म हो गया है। आज भी वे पल याद आते हैं तो बड़ा भावुक कर देते हैं। दसवीं कक्षा में जब रतनपुरा के सरकारी सीनियर स्कूल से खेल की शुरुआत की थी तो बहुत से लोगों ने कहा कि क्यों खराब हो रहा है, विकलांग भी कभी खेल सकता है क्या। पढाई पर फोकस करो तो क्या पता कोई सरकारी नौकरी मिल जाए तो जिंदगी कट जाए। जैसे जिंदगी काटना ही मकसद रह गया हो, जिंदगी जीने की तो संभावनाएं ही न हों। लेकिन मेरे भीतर एक जोश था, जुनून था, कमजोर नहीं कहलाने की जिद थी। वह इतने बड़े संघर्ष का समय था कि मैं बता नहीं सकता लेकिन मेरे मां-पिता ने हमेशा मुझे हौसला दिया। सबने मना किया लेकिन उन्होंने कभी खेलने के लिए मना नहीं किया। मुझे आगे बढ़ाया। कमजोर नहीं कहलवाने की जिद ने मुझे चैंपियन बनाया।

एक हाथ से खुद बनाता था रोटी-सब्जी

कॉलेज में जब सामान्य बच्चों के साथ खेलने जाता था लोग बहुत मजाक उड़ाते थे कि यह सिफारिशी है, यह कहां से आया है, यह कैसे भाला फेंकेगा। बाद में जब मैं जीतता था तो वही लोग आकर कहते थे कि सॉरी हमने आपके लिए यह बोला था। मैं कहता था कि मेरे लिए यह सामान्य बात है। मैं ये शब्द खूब सुन चुका। अब मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे इनकी आदत हो गई है। अपने अनुभवों पर चर्चा करते हुए देवेंद्र ने बताया, 1999 तक राजगढ़ के निजी संस्थान, मोहता कॉलेज में पढ़ा। 1999 में जब अखिल भारतीय विश्वविद्यालयी टूर्नामेन्ट के बाद अजमेर यूनिवर्सिटी का चैंपियन बना तो मैंने सोचा कि सरकारी कॉलेज में जाकर पढूं ताकि बचे हुए पैसे खेल पर लगा सकूं। यह सोचकर एनएम पीजी कॉलेज हनुमानगढ़ में दाखिला लिया। पैसे बचना मेरे लिए महत्त्वपूर्ण था। वहां पढ़ते हुए 1999 से 2003 तक खुद खाना बनाता था। एक हाथ से रोटी-सब्जी बनाता था। वे दिन बड़े संघर्ष के दिन थे।

ब्रिटेन से खेलने का ऑफर ठुकराया

2003 में ब्रिटिश ओपन एथलेटिक्स चैंपियनशिप में जब गोल्ड मेडल जीता तो यूके से खेलने का ऑफर मिला कि आप हमारे यहां से खेलो, सारी व्यवस्था हम कर देंगे। संघर्ष से मुक्ति का एक अवसर था, लेकिन मैंने सहजता से मना कर दिया। मैंने कहा कि खेलूंगा तो सिर्फ अपने देश के लिए और ओलंपिक मेडल जीतूंगा। और वही हुआ, 2004 में मैंने एथेंस ओलंपिक में मैंने गोल्ड मेडल जीता। देश ने मुझे बहुत मान-सम्मान दिया। आज पद्म भूषण मिला है तो बहुत अधिकार के साथ कह सकता हूं कि मेरा डिसीजन बहुत अच्छा था। इससे बड़ी खुशी मेरे लिए और क्या होगी। मुझे ही नहीं, पूरे राजस्थान के खेल जगत को आज पद्मभूषण मिला है। सारे देश के पैरा-स्पोर्ट्स को पद्म भूषण मिला है।

पत्नी मंजु ने किया सपोर्ट

2007 में जब शादी के बाद जिम्मेदारियां बढ़ीं लेकिन सारी जिम्मेदारियां मेरी वाइफ मंजु ने संभाली। शादी-ब्याह, बच्चों के एडमिशन, पढाई समेत सभी पारिवारिक, सामाजिक दायित्व इस तरह निभाए कि मुझे खेल के अलावा कोई काम न था। मुझे कुछ भी और नहीं करना पड़ा। केवल स्पोर्टस के लिए काम करता रहा। मंजु खुद खिलाड़ी हैं तो समझती हैं कि क्या ट्रेनिंग प्लान हो सकता है। खिलाड़ी को फिजिकली फिटनेस के साथ-साथ मेंटली भी फिट होना चाहिए। यह मेरे लिए अच्छा रहा।

भारत सरकार दे रही खेलों को बढावा

देवेंद्र ने बताया कि पिछले 6-7 साल में भारत सरकार ने खेलों को बढ़ावा देने की दिशा मंे बहुत काम किया है। आज खिलाड़ियों को स्पोर्ट्स साइंस का पूरा सपोर्ट मिल रहा है। प्रशिक्षण केंद्रों में सरकार ने फिजियोथेरेपिस्ट, साइकेट्रिस्ट, फिटनेस ट्रेनर लगा रखे हैं। यही वजह है कि भारत का प्रदर्शन बहुत सुधरा है। टोक्यो ओलंपिक और पैरा-ओलंपिक में हमने देखा। हमने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया और खूब पदक जीते। आने वाला समय और बेहतरीन होगा लेकिन इसके लिए हमें और भी बहुत काम करने की जरूरत है। ग्रास रूट पर बहुत काम करने की जरूरत है। देश के गांवों में प्रतिभाशाली बच्चे निवास करते हैं। उन बच्चों गांवों तक स्पोर्ट्स को पहुंचाना है। इसमें हर व्यक्ति को अपना रोल निभाना पड़ेगा। चाहे वो फिजिकल टीचर ह, चाहे वो पेरेंट्स हो और चाहे वो सरकार हो, हम सभी को तय करना होगा कि खेल बहुत जरूरी है। केवल ओलंपिक मेडल के लिए ही नहीं, हमारे जीवन के लिए भी खेल जरूरी है। खेल हमें कॉन्फिडेंस देता है, विल पॉवर देता है और टीम भावना सिखाता है।

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