बंगाल जीत के जश्न में भाजपा संगठन की खुली फूट!

विजय उत्सव से ज्यादा ‘क्रेडिट वॉर’ की चर्चा, जिलाध्यक्ष के आदेशों को दरकिनार कर समानांतर सूचना तंत्र सक्रिय

झुंझुनूं। अजीत जांगिड़

पश्चिम बंगाल में 74 वर्षों बाद भगवा परचम लहराने को भारतीय जनता पार्टी ऐतिहासिक राजनीतिक उपलब्धि मान रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आक्रामक चुनावी रणनीति, बूथ स्तर तक की मजबूत मैनेजमेंट प्रणाली और समर्पित कार्यकर्ताओं की अथक मेहनत ने ममता बनर्जी के लंबे समय से मजबूत माने जा रहे राजनीतिक किले में सेंध लगाने का काम किया। देशभर में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा इस जीत का उत्सव मनाया जा रहा है, लेकिन झुंझुनूं भाजपा में यह विजय उत्सव अब संगठनात्मक अनुशासन और अंदरूनी खींचतान पर गंभीर सवाल खड़े करता दिखाई दे रहा है।

जिला मुख्यालय पर आयोजित विजय उत्सव के दौरान जिस प्रकार अधिकृत सूचना तंत्र को नजरअंदाज कर अलग-अलग स्तरों से सोशल मीडिया और समाचार पत्रों तक प्रेस नोट भेजे गए, उसने भाजपा के अंदर चल रही गुटबाजी और समन्वयहीनता को सार्वजनिक कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि संगठन के अधिकृत मीडिया प्रभारी की भूमिका को ही कमजोर किया जाएगा, तो फिर संगठनात्मक अनुशासन की बात केवल भाषणों तक सीमित रह जाएगी।

सूत्रों के अनुसार भाजपा जिलाध्यक्ष द्वारा विजय उत्सव की आधिकारिक सूचना जारी करने के लिए जिला मीडिया प्रभारी को अधिकृत माना गया था, लेकिन इसके बावजूद कई अन्य पदाधिकारियों और समानांतर समूहों द्वारा अलग-अलग तरीके से सूचना प्रसारित की गई। इससे न केवल संगठन के भीतर अधिकारों के टकराव की स्थिति बनी, बल्कि यह संदेश भी गया कि जिले में पार्टी का सूचना तंत्र कई हिस्सों में बंट चुका है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा जिस संगठनात्मक अनुशासन और कैडर आधारित संरचना के लिए जानी जाती है, वहां इस प्रकार की स्थिति भविष्य के लिए खतरे की घंटी मानी जा सकती है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या जिला नेतृत्व अपने ही पदाधिकारियों पर नियंत्रण खो चुका है, या फिर संगठन के भीतर समानांतर शक्ति केंद्र सक्रिय हो चुके हैं?

भाजपा की बंगाल विजय को लेकर जहां कार्यकर्ताओं में उत्साह दिखाई दिया, वहीं स्थानीय स्तर पर यह उत्सव कई नेताओं के लिए स्वयं को “अधिक प्रभावशाली” साबित करने की होड़ में बदलता नजर आया। सोशल मीडिया पोस्टों से लेकर प्रेस नोट जारी करने तक में जिस प्रकार श्रेय लेने की प्रतिस्पर्धा दिखी, उसने संगठन की आंतरिक एकजुटता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते संगठनात्मक अनुशासन को मजबूत नहीं किया गया, तो यह अंदरूनी असंतोष आने वाले समय में पार्टी की कार्यशैली और जनविश्वास दोनों को प्रभावित कर सकता है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लगातार “एक संगठन-एक आवाज” की बात कही जाती रही है, लेकिन जिला स्तर पर दिखाई दे रही स्थिति इसके उलट तस्वीर पेश कर रही है।

राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा तेज है कि क्या भाजपा की ऐतिहासिक जीत के उत्सव के पीछे स्थानीय स्तर पर नेतृत्व संघर्ष और वर्चस्व की राजनीति खुलकर सामने आने लगी है? क्योंकि जश्न की चमक के बीच संगठनात्मक असंतुलन की परछाइयां भी साफ दिखाई देने लगी हैं।