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Home राजस्थान झुंझुनूं मुखर्जी के बलिदान दिवस का ‘अपहरण’!

मुखर्जी के बलिदान दिवस का ‘अपहरण’!

जिला मीडिया प्रभारी को दरकिनार कर मंडल अध्यक्ष ने भेजा प्रेस नोट, भाजपा संगठन की कार्यप्रणाली पर खड़े हुए गंभीर सवाल!, बलिदान दिवस को ‘उपाध्याय दिवस’ बताने वाली चूक ने खोली संगठनात्मक अव्यवस्था की पोल, जवाबदेही तय करने की उठी मांग!

झुंझुनूं। अजीत जांगिड़
भारतीय जनता पार्टी अपने महानायकों और वैचारिक पुरोधाओं के सम्मान की बात तो बड़े जोर-शोर से करती है, लेकिन झुंझुनूं भाजपा संगठन से सामने आई एक बड़ी चूक ने इन दावों पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के बाद जारी प्रेस नोट में कथित रूप से ऐसी तथ्यात्मक गलती सामने आई, जिसने पूरे संगठन को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है।सबसे बड़ा और गंभीर सवाल केवल इस चूक को लेकर नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया को लेकर भी उठ रहा है जिसके तहत जिला स्तर पर अधिकृत मीडिया प्रभारी की मौजूदगी के बावजूद प्रेस नोट कथित रूप से नगर मंडल अध्यक्ष की ओर से मीडिया तक पहुंचाया गया। अब संगठन के भीतर और बाहर यह चर्चा जोरों पर है कि आखिर अधिकृत मीडिया व्यवस्था को नजरअंदाज करने की जरूरत क्यों पड़ी? जब मीडिया प्रभारी है तो फिर ‘समानांतर मीडिया व्यवस्था’ क्यों? भाजपा जैसे अनुशासित संगठन में मीडिया से संवाद के लिए अधिकृत पदाधिकारियों की नियुक्ति की जाती है ताकि तथ्यात्मक शुद्धता और संगठनात्मक अनुशासन बना रहे। लेकिन झुंझुनूं में जो स्थिति सामने आई है, उसने कई असहज प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि जिला मीडिया प्रभारी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं तो फिर प्रेस नोट किसी अन्य पदाधिकारी द्वारा क्यों जारी किया गया? यदि अधिकृत व्यवस्था को दरकिनार किया गया तो किसके निर्देश पर किया गया? और यदि ऐसा किया गया तो क्या यह संगठनात्मक मर्यादाओं के अनुरूप था? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह मामला केवल एक प्रेस नोट का नहीं बल्कि संगठन के भीतर समन्वय और जवाबदेही का भी है।

मुखर्जी का बलिदान दिवस, लेकिन प्रेस नोट में बदल गया संदर्भ

23 जून भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस के रूप में पूरे देश में मनाया जाता है। प्रदेश नेतृत्व के निर्देश पर राजस्थान भर में इसी विषय पर कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। ऐसे में झुंझुनूं से जारी प्रेस सामग्री में यदि उनके स्थान पर पंडित दीनदयाल उपाध्याय का संदर्भ सामने आता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रेस नोट जारी करने से पहले उसका सत्यापन किया गया था या नहीं? और यदि किया गया था तो इतनी बड़ी तथ्यात्मक त्रुटि कैसे रह गई?

चूक छोटी नहीं, भाजपा की वैचारिक पहचान से जुड़ा मामला

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा की पूरी वैचारिक विरासत कुछ प्रमुख महानायकों के योगदान पर आधारित है। ऐसे में उनके नाम, तिथियों और ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर हुई गलती को सामान्य टंकण त्रुटि कहकर टालना आसान नहीं होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संगठन अपने ही वैचारिक पुरोधाओं से जुड़े कार्यक्रमों में तथ्यात्मक शुद्धता सुनिश्चित नहीं कर पाए तो इससे कार्यकर्ताओं और आमजन के बीच गलत संदेश जा सकता है।

जवाबदेही तय होगी या मामला दब जाएगा?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे मामले में जिम्मेदारी किसकी तय होगी। क्या संगठन यह स्पष्ट करेगा कि प्रेस नोट किस स्तर से जारी हुआ? क्या अधिकृत मीडिया व्यवस्था को दरकिनार किए जाने की जांच होगी? क्या तथ्यात्मक त्रुटि के लिए जवाबदेही तय की जाएगी? भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच भी यह चर्चा तेज है कि यदि संगठनात्मक अनुशासन सभी के लिए समान है तो इस मामले में भी स्पष्टता और पारदर्शिता दिखाई जानी चाहिए।

प्रदेश नेतृत्व की ओर टिकी निगाहें

इस पूरे घटनाक्रम के बाद कार्यकर्ताओं और राजनीतिक पर्यवेक्षकों की निगाहें अब प्रदेश नेतृत्व पर टिक गई हैं। सवाल केवल एक प्रेस नोट की गलती का नहीं है, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन, मीडिया प्रबंधन और वैचारिक गंभीरता की विश्वसनीयता का है।फिलहाल झुंझुनूं भाजपा संगठन के सामने दोहरे सवाल खड़े हैं। पहला, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान दिवस से जुड़ी कथित तथ्यात्मक चूक का; और दूसरा, अधिकृत जिला मीडिया प्रभारी की मौजूदगी के बावजूद मीडिया तंत्र को दरकिनार कर प्रेस नोट जारी किए जाने का। अब देखना यह है कि संगठन इस मामले को महज एक भूल मानता है या जवाबदेही तय कर स्पष्ट संदेश देता है।

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