11 महीने बाद बहाल हुए झुंझुनूं डिईओ मनोज ढाका; शिक्षा विभाग को फटकार, बोले— “आरोप गलत साबित हुए, यही मेरी सबसे बड़ी जीत”
झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
राजस्थान के शिक्षा विभाग में झुंझुनूं में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी। करीब 11 महीने से निलंबन झेल रहे प्रारंभिक शिक्षा विभाग झुंझुनूं के जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ ) मनोज ढाका को राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश पर रिटायरमेंट से महज 60 मिनट पहले दोबारा पदभार सौंपा गया। शाम 4:30 बजे उन्होंने कार्यालय में कार्यभार ग्रहण किया और ठीक एक घंटे बाद शाम 5:30 बजे सम्मानपूर्वक सेवानिवृत्त हो गए।यह मामला केवल एक अधिकारी की बहाली नहीं, बल्कि न्यायपालिका द्वारा प्रशासनिक कार्रवाई पर उठाए गए सवालों और एक अधिकारी की “सम्मान की लड़ाई” का प्रतीक बन गया। हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग को कड़ी फटकार लगाते हुए निलंबन आदेश रद्द कर तत्काल बहाली के निर्देश दिए।
मनोज ढाका ने भावुक अंदाज में कहा— “मेरे लिए एक घंटे की नौकरी नहीं, सम्मान मायने रखता था। आरोप गलत निकले और मुझे ससम्मान रिटायरमेंट मिला, यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।”
क्या था पूरा मामला
प्रारंभिक शिक्षा विभाग झुंझुनूं में डीईओ पद पर कार्यरत मनोज ढाका को 20 मई 2025 को निलंबित कर दिया गया था। विभाग ने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने ट्रांसफर नियमों की अनदेखी करते हुए दूरदराज के स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को जिला मुख्यालय और शहर के आसपास के स्कूलों में पदस्थापित किया। विभागीय कार्रवाई के तहत उनका मुख्यालय शिक्षा निदेशालय, बीकानेर कर दिया गया था। उस समय इसे शिक्षा विभाग की बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई माना गया था।ढाका ने इस आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी। जून 2025 में दायर अपील पर सुनवाई के बाद नवंबर 2025 में कोर्ट ने निलंबन आदेश पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद विभाग ने उन्हें दोबारा पदभार नहीं सौंपा। मामला दोबारा कोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए शिक्षा विभाग को फटकार लगाई और स्पष्ट आदेश दिए कि अधिकारी को तत्काल प्रभाव से बहाल किया जाए। कोर्ट की सख्ती के बाद हरकत में आया विभाग ॥ हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद शिक्षा विभाग में हलचल मच गई। 30 अप्रैल को शाम करीब 4:30 बजे मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी अशोक कुमार शर्मा ने बहाली और जॉइनिंग आदेश जारी किए। मनोज ढाका सीधे कार्यालय पहुंचे और प्रारंभिक जिला शिक्षा अधिकारी का पदभार ग्रहण किया। हालांकि उसी दिन उनका सेवानिवृत्ति दिवस भी था, इसलिए मात्र एक घंटे बाद शाम 5:30 बजे वे सेवा से मुक्त हो गए। लेकिन यह एक घंटा उनके लिए पूरे 11 महीने के संघर्ष पर न्यायिक मुहर जैसा साबित हुआ।
“सम्मान की लड़ाई जीत गया”
सेवानिवृत्त डीईओ मनोज ढाका ने कहा कि उन पर लगाए गए आरोप अंततः गलत साबित हुए। उन्होंने कहा— “मैंने पूरे आत्मविश्वास के साथ न्यायपालिका पर भरोसा रखा। आखिरकार सच सामने आया और मुझे सम्मान के साथ विदाई मिली।” रिटायरमेंट से महज एक घंटे पहले हुई यह बहाली अब पूरे शिक्षा विभाग और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है। कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच इसे न्यायपालिका की सख्ती और “सम्मानजनक सेवा” के अधिकार से जोड़कर देखा जा रहा है।













