जिले की एक नगर परिषद और 18 नगरपालिकाओं के 555 वार्डों में पार्षद बनने की दौड़, 1500 से ज्यादा दावेदारों के साथ कांग्रेस में टिकट की जंग, भाजपा में भी 1350 से अधिक ने ठोकी दावेदारी; टिकट कटते ही भीतरघात का डर, वरिष्ठ नेताओं को दी गई नाराजगी संभालने की जिम्मेदारी
झुंझुनूं। अजीत जांगिड़
नगरीय निकाय चुनाव का बिगुल बजते ही झुंझुनूं में भाजपा और कांग्रेस के भीतर टिकट को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। जिले की एक नगर परिषद और 18 नगरपालिकाओं के 555 वार्डों में पार्षद बनने की दौड़ ने दोनों प्रमुख दलों के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है। एक टिकट के लिए दावेदारों की लंबी कतार है और टिकट नहीं मिलने वाले दावेदारों को साथ रखना अब पार्टी नेतृत्व की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। कांग्रेस में 1500 से अधिक और भाजपा में करीब 1350 से अधिक आवेदन आने की बात सामने आ रही है। आवेदन प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब दोनों दलों में अंदरखाने मंथन, समीकरणों की गणित और संभावित उम्मीदवारों की छंटनी का दौर शुरू हो गया है। 28 अगस्त के बाद टिकटों की तस्वीर साफ होने की संभावना के साथ ही दोनों दलों के सामने असली राजनीतिक परीक्षा शुरू होगी।
टिकट एक, दावेदार अनेक… नाराजगी रोकना सबसे बड़ी चुनौती
वार्डवार कई मजबूत दावेदार मैदान में होने से टिकट वितरण दोनों दलों के लिए आसान नहीं है। पार्टी जिसे टिकट देगी, उसके समर्थन में बाकी दावेदार कितनी मजबूती से खड़े होते हैं, यही चुनावी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण सवाल बन गया है। यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस ने संभावित रूप से संवेदनशील वार्डों में वरिष्ठ नेताओं और संगठन के जिम्मेदार पदाधिकारियों को सक्रिय करने की तैयारी शुरू कर दी है। मकसद टिकट घोषित होने के बाद पैदा होने वाले असंतोष को चुनावी नुकसान में बदलने से पहले ही संभालना है।
भाजपा में कार्यकर्ता बनाम दावेदारों की लंबी कतार
भाजपा ने टिकट चयन में संगठनात्मक सक्रियता और स्थानीय स्वीकार्यता को अहम कसौटी बनाने के संकेत दिए हैं। झुंझुनूं में पार्टी की बैठकों में कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने पर भी जोर दिया गया है। वार्डवार दावेदारों की सामाजिक पकड़, जनसंपर्क, संगठन में सक्रियता और जीत की संभावना का आकलन किया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर तैयार होने वाले पैनल के साथ वरिष्ठ पदाधिकारियों और संगठन से जुड़े नेताओं का फीडबैक भी महत्वपूर्ण रहेगा। लेकिन यहां भी सबसे बड़ा सवाल यही है—जिसे टिकट नहीं मिलेगा, क्या वह पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के साथ पूरी ताकत से खड़ा रहेगा? यही आशंका भाजपा के लिए टिकट चयन से बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
कांग्रेस में डिजिटल आवेदन से लेकर स्थानीय समीकरण तक मंथन
कांग्रेस ने इस बार टिकट आवेदन प्रक्रिया में डिजिटल व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने टिकट दावेदारी के लिए ऑनलाइन आवेदन व्यवस्था शुरू की थी। पार्टी स्तर पर प्राप्त आवेदनों को संबंधित जिला कांग्रेस कमेटियों तक भेजने और जिला स्तर पर राजनीतिक मामलों की समितियों के जरिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात सामने आई है। ऐसे में झुंझुनूं में कांग्रेस के सामने भी सबसे बड़ा सवाल सिर्फ योग्य उम्मीदवार तलाशना नहीं, बल्कि टिकट की दौड़ में पीछे छूटने वाले दावेदारों और उनके समर्थकों को चुनाव तक एकजुट रखना है।
सोशल मीडिया पर टिकट घोषित होने से पहले ही ‘प्रत्याशी’ बनने की होड़
टिकटों की आधिकारिक घोषणा से पहले ही संभावित दावेदारों की सोशल मीडिया पर सक्रियता ने दोनों दलों की चिंता बढ़ा दी है। कई दावेदार अपने समर्थकों के साथ प्रचार सामग्री और संभावित उम्मीदवारी से जुड़े पोस्ट साझा कर रहे हैं। पार्टी स्तर पर कार्यकर्ताओं से अपील की जा रही है कि अधिकृत घोषणा से पहले खुद को पार्टी प्रत्याशी बताकर प्रचार नहीं करें। दरअसल, संगठन के लिए यह सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट का मामला नहीं है। ऐसे पोस्ट टिकट नहीं मिलने के बाद पैदा होने वाले असंतोष और सार्वजनिक विरोध का आधार बन सकते हैं।
जातीय-सामाजिक समीकरणों से लेकर बूथ तक की रिपोर्ट खंगाली जा रही
टिकट चयन में वार्ड का सामाजिक समीकरण, जातीय संतुलन, बूथ स्तर की स्थिति, पिछले चुनावों का प्रदर्शन, दावेदार की स्थानीय पकड़ और संगठन में सक्रियता जैसे पहलुओं को देखा जा रहा है। यानी अब टिकट सिर्फ ‘किसकी सिफारिश भारी है’ के आधार पर तय करने के बजाय जीत की संभावनाओं का पूरा गणित सामने रखकर फैसला लेने की कोशिश होगी। हालांकि अंतिम सूची सामने आने के बाद ही पता चलेगा कि सर्वे और संगठनात्मक फीडबैक में किसकी दावेदारी भारी पड़ी।
पार्टी पदाधिकारी ही चुनाव लड़ने उतरे तो संगठन कौन संभालेगा?
दोनों दलों के सामने एक और पेच है। संगठन से जुड़े पदाधिकारी, बूथ प्रभारी और उनके परिवार के सदस्य भी बड़ी संख्या में टिकट की दौड़ में हैं। ऐसे में यदि संगठन के महत्वपूर्ण लोग ही प्रत्याशी बनते हैं तो बूथ प्रबंधन और चुनाव संचालन की जिम्मेदारी किसके कंधों पर होगी, यह सवाल भी पार्टी बैठकों में उठ रहा है। इसलिए टिकट वितरण में उम्मीदवार की व्यक्तिगत जीत की संभावना के साथ संगठन की चुनावी मशीनरी को मजबूत बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा।
28 अगस्त के बाद खुलेगा टिकट का पिटारा, फिर दिखेगा असली असंतोष
27 अगस्त से नामांकन शुरू होगा और 31 अगस्त अंतिम तारीख रहेगी। मतदान 9 और 11 सितंबर को तथा मतगणना 14 सितंबर को होगी। फिलहाल भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक संकट यही है कि टिकट बांटना आसान है, लेकिन टिकट कटने के बाद अपने ही दावेदारों को संभालना मुश्किल।28 अगस्त के बाद जैसे-जैसे टिकटों की सूची सामने आएगी, वैसे-वैसे राजनीतिक गलियारों में नाराजगी, समर्थन, विरोध, मान-मनौव्वल और समीकरणों की असली तस्वीर भी सामने आएगी। निकाय चुनाव का अंतिम मुकाबला भले ही भाजपा-कांग्रेस के बीच हो, लेकिन उससे पहले दोनों दलों को अपने ही घर के भीतर उठने वाले विरोध से निपटना होगा।झुंझुनूं में निकाय चुनाव का मैदान सज चुका है, लेकिन फिलहाल सबसे बड़ा मुकाबला विपक्ष से नहीं, टिकट के भीतर ही है। हजारों दावेदारों में से चंद चेहरों को टिकट मिलेगा और बाकी को मनाने की जिम्मेदारी वरिष्ठ नेतृत्व पर होगी। टिकट की सूची निकलते ही साफ होगा कि पार्टियों की रणनीति कितनी मजबूत है और टिकट की नाराजगी चुनावी नुकसान में बदलती है या नहीं।





