चिड़ावा। झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
आज की फिंगर प्रिंट और जीपीएस जैसी आधुनिक तकनीक से पूर्व भी हमारे यहां एक पदचिह्न पारंपरिक प्रणाली प्रचलित थी। जिससे पदचिह्न देखकर अपराधियों तक पहुंचा जाता था। चिड़ावा के देवालयों, हवेलियों, यहां की दानवीरता, तथा परंपरा पर विशेष शोध करने वाले प्रमुख सामाजिक चिंतक एवं अन्वेषी लेखक महेश कुमार शर्मा आजाद ने बताया कि खेतड़ी ठिकाने के समय जब कहीं ब्लाइंड मर्डर या बड़ी चोरी की कोई वारदात हुआ करती थी। तब चिड़ावा से ब्राह्मण अर्जुन दास के पुत्र बल्लभ राम को बुलाया जाता था। बल्लभ राम पदचिह्नों को देखकर अपराधी के जाने का मार्ग बखूबी बता दिया करते थे। बल्लभ राम के इस कार्य को खोज निकालना कहा जाता था। उनके इस विशेष कार्य की वजह से चिड़ावा में इनका परिवार खोजी परिवार के नाम से जाना जाने लगा। चिड़ावा में इस खोजी परिवार का घर शौकीन सेठ रहे दुलीचंद ककरानिया की हवेली के सामने स्थित है। अन्वेषी लेखक आजाद ने बताया कि बीकानेर रियासत में भी यह पारंपरिक जांच प्रणाली प्रचलित थी। बीकानेर में यह पारंपरिक जांच प्रणाली पागी के नाम से जानी जाती थी। आजाद के कथनानुसार रेगिस्तानी क्षेत्र होने के कारण उन दिनों लोग घटना को अंजाम देने के बाद पैदल या फिर घोड़े या ऊंट से ही जाया करते थे। फलस्वरूप ऐसे क्षेत्र में लोगों का सुराग लगाने में यह प्रणाली ही एक कारगर प्रणाली प्रचलित थी।
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