ओलों की मार से उजड़ा अन्नदाता: नवलगढ़-गुढ़ागौड़जी में 70% तक फसल तबाह, बेर जितने ओलों ने मिनटों में मिटी महीनों की मेहनत, खेतों में बिछी ‘सफेद तबाही’; किसान बोले—अब कर्ज कैसे चुकाएं?
झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
अचानक बदले मौसम ने जिले के नवलगढ़ और गुढ़ागौड़जी इलाके में ऐसी कहर बरपाया कि अन्नदाता की उम्मीदें चंद मिनटों में बिखर गईं। तेज अंधड़, आसमान चीरती बिजली और उसके बाद हुई भीषण ओलावृष्टि ने खेतों को तबाही के मंजर में बदल दिया। जहां कल तक फसलें लहलहा रही थीं, आज वहां सफेद ओलों की मोटी परत और टूटी-बिखरी फसलें नजर आ रही हैं।
खेत बने ‘बर्फ की चादर’, बेर से बड़े गिरे ओले
नवलगढ़ क्षेत्र के देवीपुरा बणी, खिरोड़, टोंकछिलरी, मोहनबाड़ी, बारवा और अंबेडकर नगर गांवों में कुदरत का सबसे ज्यादा कहर टूटा। वहीं गुढ़ागौड़जी, पोसाणा, खीवांसर, बजावा और छऊ गांव भी ओलावृष्टि से अछूते नहीं रहे। ग्रामीणों के अनुसार, ओलों का आकार बेर से भी बड़ा था। कुछ ही देर में खेत सफेद चादर से ढक गए और खड़ी फसलें जमीन पर बिछ गईं।
30 से 70 प्रतिशत तक नुकसान,
प्याज-मिर्च सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। प्रारंभिक आकलन में सामने आया है कि कई गांवों में 30% से लेकर 70% तक फसलें पूरी तरह नष्ट हो चुकी हैं।
प्याज और मिर्च: ओलों की मार से फसल जमीन में धंस गई, पौधे टूटकर खत्म हो गए।
गेहूं और जौ: खड़ी फसलें तेज हवा और ओलों से गिर गईं, जबकि कटी फसलें पानी में भीगकर सड़ने की कगार पर हैं।
हरी सब्जियां: पौधों के सिर्फ डंठल बचे हैं, उत्पादन लगभग खत्म।
कृषि विभाग ने मानी भारी तबाही
कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. राजेंद्र लांबा के अनुसार बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने रबी की फसलों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। विशेष रूप से गेहूं, चना और जौ की फसलें प्रभावित हुई हैं। कटी फसलों के दाने काले पड़ने की आशंका है, जिससे उनकी गुणवत्ता और बाजार मूल्य दोनों गिरेंगे।
“खेत में फसल नहीं, सपने बिखरे पड़े हैं”
देवीपुरा के किसान जोधराम फागणा की आंखों में आंसू हैं। वे कहते हैं,
“यह सिर्फ फसल नहीं, हमारे साल भर के सपने थे… कोई बेटी की शादी की तैयारी कर रहा था, तो कोई बैंक का कर्ज चुकाने की उम्मीद लगाए बैठा था। अब समझ नहीं आ रहा घर कैसे चलेगा।”
मुआवजे की मांग तेज, गिरदावरी की उठी मांग
ग्रामीणों ने प्रशासन से तुरंत विशेष गिरदावरी करवाने और वास्तविक नुकसान का आकलन कर उचित मुआवजा देने की मांग की है। किसानों का कहना है कि समय पर राहत नहीं मिली तो आर्थिक संकट और गहरा जाएगा।
72 घंटे में दें सूचना, वरना अटक सकता है क्लेम
प्रशासन ने किसानों को आगाह किया है कि फसल नुकसान की सूचना 72 घंटे के भीतर बीमा कंपनी या कृषि विभाग को देना अनिवार्य है। देरी होने पर मुआवजा प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
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