गठियाबाय के इलाज में ‘कार-टी’ तकनीक बन सकती है वरदान
नवलगढ़। झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित चिकित्सक और दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े सरकारी रॉयल एडिलेड हॉस्पिटल के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. प्रवीण कुमार हिसारिया ने कहा है कि आने वाले पांच–छह वर्षों में कैंसर की तरह गठियाबाय (रूमेटाइड आर्थराइटिस) जैसी ऑटोइम्यून बीमारियों की रोकथाम के लिए ‘कार-टी’ सेल थेरेपी एक प्रभावी विकल्प बनकर सामने आ सकती है। उन्होंने इसे गठियाबाय मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं बताया। डॉ. हिसारिया 11 वर्षों बाद अपने गृह नगर झुंझुनूं जिले के नवलगढ़ कस्बे में पहुंचे। जहां उन्होंने विप्र मंडल द्वारा आयोजित स्वास्थ्य शिविर में सेवाएं दीं। यह शिविर उनके दादा स्वर्गीय सीताराम हिसारिया की स्मृति में उनके पिता शशि हिसारिया की ओर से आयोजित किया गया था। शिविर में लगभग 200 से अधिक मरीजों को निशुल्क परामर्श दिया गया। डॉ. हिसारिया ने बताया कि ‘कार-टी’ सेल थेरेपी वर्तमान में मुख्य रूप से ब्लड कैंसर के उपचार में उपयोग हो रही है। यह तकनीक शरीर की प्रतिरक्षा कोशिकाओं (टी सेल्स) को संशोधित कर बीमारी से लड़ने के लिए सक्षम बनाती है। उन्होंने बताया कि रूमेटाइड गठिया जैसी बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही जोड़ों पर हमला करती है। ऐसे में ‘कार-टी’ तकनीक भविष्य में उन गलत बी-सेल्स को समाप्त कर सकती है। जो ऑटोएंटीबॉडी बनाकर सूजन और दर्द का कारण बनती हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि गठियाबाय में इसका उपयोग अभी शोध और क्लिनिकल ट्रायल के चरण में है। लेकिन प्रारंभिक अध्ययनों में सकारात्मक संकेत मिले हैं। इससे पहले मंडावा से आए महाराज गणेश चैतन्य ने दीप प्रज्जवलित कर शिविर का शुभारंभ किया। विप्र मंडल के ओमप्रकाश सर्राफ, रामस्वरूप बासोतिया, मुरारीलाल, नरोत्तम शर्मा, शेखर मिश्रा, महेश मिश्रा, पवन नागवान ने शिविर में सहयोग दिया। वहीं अंत में राकेश हिसारिया व संदीप हिसारिया ने आभार जताया।

हर जोड़ का दर्द हड्डी का रोग नहीं
डॉ. हिसारिया ने लोगों को जागरूक करते हुए कहा कि हर जोड़ का दर्द केवल ऑर्थोपेडिक समस्या नहीं होता। कई बार यह ऑटोइम्यून बीमारी का संकेत हो सकता है। इसलिए सही बीमारी की पहचान कर क्लिनिकल इम्यूनोलॉजिस्ट या रूमेटोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श लेना जरूरी है। उन्होंने चिकित्सा परिपाटी में बदलाव की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि सही निदान ही सही उपचार की कुंजी है। गठियाबाय के बढ़ते मामलों पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि बदलती जीवनशैली, अस्वस्थ खान-पान, धूप से दूरी और आनुवंशिक कारण इसके प्रमुख कारक हैं। उन्होंने लोगों को नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और पर्याप्त धूप लेने की सलाह दी।
विशेषज्ञों ने दी निशुल्क सेवाएं
इस स्वास्थ्य शिविर में निरमया हेल्थ केयर जयपुर के क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी एवं रूमेटोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. बनवारी शर्मा तथा एसएमएस जयपुर के विशेषज्ञ डॉ. अविनाश जैन ने भी मरीजों को निशुल्क परामर्श दिया। कार्यक्रम में ओमप्रकाश सर्राफ, शेखावाटी फाउंडेशन के राष्ट्रीय प्रभारी पशुपति कुमार शर्मा, राकेश लाटा सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने चिकित्सकों का सम्मान किया।
इम्यून सिस्टम को “रीसेट” करेगा ‘कार-टी’
डॉ. हिसारिया के अनुसार, यदि ‘कार-टी’ तकनीक गठियाबाय में सफल होती है। तो यह केवल लक्षणों को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं रहेगी। बल्कि इम्यून सिस्टम को “रीसेट” कर लंबे समय तक रोग को शांत रखने में सक्षम हो सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी बड़े स्तर के शोध और परीक्षण बाकी हैं, लेकिन चिकित्सा विज्ञान इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित चिकित्सक की यह जानकारी गठियाबाय मरीजों के लिए नई आशा लेकर आई है। आने वाले वर्षों में ‘कार-टी’ तकनीक यदि सफल होती है। तो यह ऑटोइम्यून बीमारियों के उपचार में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित हो सकती है। अभी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। लेकिन संभावना है कि अगर शोध सफल रहा, तो यह कुछ मरीजों में लंबे समय तक बीमारी को शांत कर सके। ‘कार-टी’ सेल थैरेपी का उपयोग अभी मुख्य रूप से कैंसर में होता है।
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