सम्मान के मंच पर भेदभाव के आरोप, ‘मेधा’ के नाम पर आंकड़ों की राजनीति—सवालों के घेरे में आयोजन की नीयत और निष्पक्षता !
झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
जानकारी के अनुसार सम्मान समारोह के नाम पर तैयार हो रहा एक मंच अब खुद ही सवालों के कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है। दावा “मेधावी छात्रों के सम्मान” का है, लेकिन हकीकत यह है कि यहां मेधावी को सिर्फ 90% की संकीर्ण परिभाषा में कैद कर दिया गया है। यह आयोजन शुरू होने से पहले ही एक तीखा विवाद बन चुका है—क्या 89% लाने वाला छात्र अचानक ‘कमतर’ हो जाता है? क्या उसकी मेहनत, संघर्ष और उपलब्धियां इस मंच के लिए कोई मायने नहीं रखतीं?
“प्रतिभा नहीं, प्रतिशत का तख्त!”
समारोह के नियम साफ इशारा कर रहे हैं कि यहां प्रतिभा नहीं, प्रतिशत का वर्चस्व चलेगा। शिक्षा के व्यापक दायरे — खेल, कला, सांस्कृतिक उपलब्धियां, या विपरीत परिस्थितियों में हासिल की गई सफलता—इन सबको एक झटके में खारिज कर दिया गया है। यह वही सोच है जो बच्चों को ‘अंक मशीन’ में बदलने की खतरनाक मानसिकता को बढ़ावा देती है। सवाल उठ रहा है, क्या समाज अब प्रतिभा को नहीं, सिर्फ मार्कशीट को पहचान देगा?
“सम्मान या संकीर्णता का प्रदर्शन?”
आयोजन का उद्देश्य भले ही उत्साहवर्धन बताया जा रहा हो, लेकिन जमीनी सच्चाई इसे एक सीमित और भेदभावपूर्ण दायरे में बांधती दिख रही है।क्या चयन प्रक्रिया पारदर्शी है? क्या सभी वर्गों और विविध प्रतिभाओं को अवसर मिला? या यह सिर्फ “उच्च प्रतिशत क्लब” बनकर रह गया है? इन सवालों के जवाब फिलहाल धुंध में हैं, लेकिन आरोप साफ और सीधे हैं—सम्मान के नाम पर बहिष्कार।
“सामाजिक मंच या राजनीतिक प्रयोगशाला?”
सूत्रो के अनुसार कार्यक्रम में राजनीतिक उपस्थिति को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। स्थानीय स्तर पर यह धारणा बनती जा रही है कि ऐसे आयोजन अब सामाजिक कम, राजनीतिक ज्यादा हो रहे हैं। क्या यह मंच प्रतिभा के सम्मान का है, या फिर आगामी समीकरणों को साधने का सॉफ्ट प्लेटफॉर्म?
यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि जब सामाजिक कार्यक्रमों पर राजनीतिक छाया गहराने लगती है, तो निष्पक्षता सबसे पहले कुचली जाती है।
“प्रशासन की मौजूदगी पर भी सवाल”
सूत्रों के अनुसार कार्यक्रम में अधिकारियों को भी आमंत्रित किया गया है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस मंच से सम्मान दिया जाएगा, वहीं एक बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को पहले ही अयोग्य घोषित कर दिया गया है। क्या यह संदेश नहीं देता कि “कम अंक = कम प्रतिभा”? अगर ऐसा है, तो यह सोच न केवल गलत है, बल्कि शिक्षा के मूल उद्देश्य पर सीधा प्रहार है।
“समाज को क्या संदेश?”
यह आयोजन अब एक बड़े सामाजिक प्रश्न में बदल चुका है— क्या हम आने वाली पीढ़ी को यह सिखा रहे हैं कि इंसान की कीमत सिर्फ उसके अंकों से तय होती है? अगर जवाब “हां” है, तो यह न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि हजारों मेहनती और संघर्षशील विद्यार्थियों के आत्मविश्वास पर सीधा हमला है। “सम्मान समारोह” का मौजूदा स्वरूप यह सवाल उठाने के लिए मजबूर कर रहा है कि क्या यह सच में प्रतिभा का सम्मान है, या फिर प्रतिशत की चकाचौंध में असली काबिलियत को नजरअंदाज करने का एक और उदाहरण? अब निगाहें आयोजकों पर टिकी हैं, क्या वे इन तीखे सवालों का जवाब देंगे, या फिर यह कार्यक्रम भी ‘90% की दीवार’ के भीतर कैद एक सीमित सोच का प्रतीक बनकर रह जाएगा?
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