अवकाश कटौती से भड़का आक्रोश, 7 अप्रैल से चरणबद्ध आंदोलन शुरू—जयपुर से रामगंजमंडी तक गूंजेगी शिक्षकों की आवाज
झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
राजस्थान में शिक्षकों के सब्र का बांध अब टूटता नजर आ रहा है। ग्रीष्मावकाश समेत अन्य अवकाशों में कटौती और लंबित मांगों को लेकर राजस्थान शिक्षक संघ (सियाराम) ने पूरे प्रदेश में बड़े आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। संगठन ने इस संघर्ष को “एक और सम्मान की लड़ाई” का नाम देते हुए साफ संकेत दे दिया है कि अब शिक्षक अपने अधिकारों और सम्मान के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ेंगे।
शिविरा पंचांग 2026-27 में अवकाशों में कथित कटौती को लेकर शिक्षकों में भारी नाराजगी है। संघ का आरोप है कि बिना किसी संवाद और सहमति के लिए गए फैसलों ने न केवल शिक्षकों का मनोबल तोड़ा है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के संतुलन को भी प्रभावित किया है।
7 अप्रैल से सड़कों पर दिखेगा विरोध
संघ द्वारा घोषित कार्यक्रम के तहत 7 अप्रैल से आंदोलन की शुरुआत होगी। इस दिन प्रदेशभर के शिक्षक काली पट्टी बांधकर अपने-अपने कार्यस्थलों पर ड्यूटी करेंगे और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराएंगे। इसे एकजुटता और चेतावनी का पहला संकेत माना जा रहा है।
ज्ञापन से लेकर विशाल रैली तक रणनीति तैयार
आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाते हुए 8 अप्रैल को उपखंड स्तर पर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे जाएंगे। इसके बाद 20 अप्रैल को जिला मुख्यालयों पर कलेक्ट्रेट के बाहर प्रदर्शन कर आंदोलन को और तेज किया जाएगा। आंदोलन का सबसे बड़ा चरण 18 मई को सामने आएगा, जब रामगंजमंडी—शिक्षा मंत्री के विधानसभा क्षेत्र—में विशाल शिक्षक रैली और भव्य प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। यह आयोजन आंदोलन को निर्णायक मोड़ देने वाला माना जा रहा है।
‘सम्मान और अधिकारों की लड़ाई’—संघ का आह्वान
संघ के प्रदेश नेतृत्व ने सभी शिक्षक साथियों से अपील की है कि वे आंदोलन के हर चरण में सक्रिय भागीदारी निभाएं। संगठन का कहना है कि यह लड़ाई केवल अवकाशों की नहीं, बल्कि शिक्षक सम्मान, कार्य परिस्थितियों और शिक्षा व्यवस्था के भविष्य की लड़ाई है।
प्रदेशभर में बढ़ी हलचल, सरकार पर बढ़ेगा दबाव
आंदोलन की घोषणा के बाद शिक्षा जगत में हलचल तेज हो गई है। बड़ी संख्या में शिक्षक इस आंदोलन के समर्थन में खुलकर सामने आ रहे हैं, जिससे आने वाले दिनों में सरकार पर दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है। राजस्थान में उठी यह ‘सम्मान की आवाज’ अब आंदोलन का रूप ले चुकी है। यदि समय रहते समाधान नहीं निकला, तो यह संघर्ष शिक्षा व्यवस्था पर व्यापक असर डाल सकता है। आने वाले हफ्तों में यह स्पष्ट होगा कि यह आंदोलन केवल चेतावनी है या फिर एक बड़े बदलाव की शुरुआत।
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