पीड़ित और शोषितों की आवाज बनता उपभोक्ता आयोग

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विश्व उपभोक्ता दिवस (15 मार्च) विशेष

‘उपभोक्ता देवो भवः’ का संकल्प ही विकसित राष्ट्र की आधारशिला

— मनोज कुमार मील, अध्यक्ष, जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, झुंझुनूं

झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
विश्व का प्रत्येक नागरिक किसी न किसी रूप में उपभोक्ता है। बाजार की पूरी व्यवस्था उपभोक्ता पर ही आधारित होती है। वस्तुएं और सेवाएं तभी अर्थपूर्ण होती हैं। जब उन्हें उपयोग करने वाला उपभोक्ता मौजूद हो। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि उपभोक्ता ही बाजार व्यवस्था की धुरी है और उसकी जागरूकता ही किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति का आधार बनती है। प्राचीन काल से लेकर आज तक यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हुआ है कि जिन देशों के नागरिक एक उपभोक्ता के रूप में जागरूक और समझदार रहे हैं, वहां बाजार व्यवस्था अधिक पारदर्शी और जिम्मेदार बनी है। साथ ही जहां सेवा प्रदाताओं ने उपभोक्ता देवो भवः की भावना को सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। वहां विकास की गति भी तेज हुई है। भारत में तो प्राचीन समय से ही अतिथि देवो भवः की भावना समाज की संस्कृति का हिस्सा रही है। इसी भावना को आधुनिक समय में उपभोक्ता अधिकारों के रूप में सशक्त स्वरूप देने का प्रयास किया गया। देश में पहली बार उपभोक्ताओं के अधिकारों की मजबूत नींव 24 दिसंबर 1986 को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के रूप में रखी गई। यह पहल भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में हुई। जिसने उपभोक्ताओं को न्याय दिलाने का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया। समय के साथ बाजार की जटिलताओं और उपभोक्ताओं के सामने आने वाली नई चुनौतियों को देखते हुए इस कानून को और अधिक सशक्त बनाया गया। इसी दिशा में पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 लागू किया गया। जो 20 जुलाई 2020 से प्रभावी हुआ। इस नए कानून ने उपभोक्ताओं को अधिक मजबूत अधिकार प्रदान किए और उपभोक्ता आयोगों को भी अधिक प्रभावी शक्तियां दीं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के लागू होने के बाद उपभोक्ता आयोग वास्तव में पीड़ित और शोषित वर्ग की आवाज बनकर उभरे हैं। आयोग को दंडात्मक कार्रवाई की शक्ति मिलने से उसके निर्णयों को लागू करवाने में भी आसानी हुई है। आज देशभर में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां उपभोक्ता आयोग ने आम नागरिक को त्वरित और प्रभावी न्याय दिलाकर न्याय व्यवस्था में लोगों का विश्वास मजबूत किया है। झुंझुनूं जिले में भी उपभोक्ता आयोग आमजन के हितों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है। हाल ही में अफॉर्डेबल हाउसिंग योजना के तहत फ्लैट्स का कब्जा दिलवाने से जुड़े मामलों की सुनवाई जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में प्रक्रियाधीन है। जिससे प्रभावित उपभोक्ताओं को न्याय मिलने की उम्मीद मजबूत हुई है। यह उदाहरण इस बात को दर्शाता है कि उपभोक्ता आयोग केवल एक न्यायिक मंच ही नहीं। बल्कि आम नागरिक के अधिकारों का संरक्षक भी है। उपभोक्ताओं को त्वरित और सुलभ न्याय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वैकल्पिक विवाद समाधान के प्रयास भी किए जा रहे हैं। इसी क्रम में वर्ष 2026 की प्रथम राष्ट्रीय लोक अदालत में जिला उपभोक्ता आयोग झुंझुनूं में लंबित परिवादों तथा प्री-लिटिगेशन प्रार्थना पत्रों सहित कुल 133 प्रकरणों का आपसी समझाइश के माध्यम से निस्तारण किया गया। यह पहल न केवल न्याय प्रक्रिया को सरल बनाती है, बल्कि समय और संसाधनों की भी बचत करती है। विश्व उपभोक्ता दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि जागरूक उपभोक्ता ही स्वस्थ और पारदर्शी बाजार व्यवस्था का आधार होता है। यदि उपभोक्ता अपने अधिकारों के प्रति सजग रहेगा। तो बाजार में अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही स्वतः स्थापित होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक नागरिक एक समझदार और जागरूक उपभोक्ता बने। वस्तुओं और सेवाओं का उपयोग करते समय सावधानी बरते, बिल अवश्य ले, नियम और शर्तों को समझे और किसी भी प्रकार के अन्याय या शोषण की स्थिति में अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाए। आइए, विश्व उपभोक्ता दिवस के अवसर पर हम सभी यह संकल्प लें कि उपभोक्ता देवो भवः की भावना को व्यवहार में उतारेंगे। जागरूक उपभोक्ता बनेंगे और विकसित भारत के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएंगे। क्योंकि जब उपभोक्ता सशक्त होगा, तभी राष्ट्र भी सशक्त और विकसित होगा।

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