बीमा कंपनी की मनमानी पर जिला उपभोक्ता आयोग सख्त, रिलायंस जनरल इंश्योरेंस को 1.81 लाख रुपये चुकाने के आदेश

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हैल्थ इंश्योरेंसन का क्लैम नहीं देने का मामला, 11 वर्षों की देरी करने पर 9 फीसदी ब्याज भी देना होगा बीमा धारक को, सुप्रीम कोर्ट की नजीर के साथ आयोग अध्यक्ष मनोज मील की टिप्पणी, बीमा कंपनी से केवल अपने मुनाफे की परवाह की उम्मीद नहीं की जाती

झुंझुनूं । अजीत जांगिड़
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, झुंझुनूं ने बीमा कंपनियों की मनमानी के खिलाफ अहम फैसला सुनाते हुए रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी को उपभोक्ता को बीमा दावा राशि का भुगतान करने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने इसे सेवा में गंभीर कमी मानते हुए कंपनी को ब्याज सहित भुगतान करने का आदेश दिया है। आयोग अध्यक्ष मनोज कुमार मील ने सुप्रीम कोर्ट की नजीर के साथ टिप्पणी की है कि बीमा कंपनी से यह उम्मीद की जाती है कि वह बीमा धारक के साथ निष्पक्ष व्यवहार करेगा, ना कि केवल अपने मुनाफे की परवाह करेगा। मामले के अनुसार बड़ौदी की ढाणी, खेतड़ी निवासी शिशराम सैनी ने वर्ष 2013 में रिलायंस जनरल इंश्योरेंस से स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी ली थी। पॉलिसी अवधि के दौरान अक्टूबर 2014 में अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें जयपुर के एक निजी अस्पताल में हार्ट सर्जरी करानी पड़ी, जिस पर लगभग दो लाख रुपये का खर्च आया। इसके बाद उपभोक्ता द्वारा सभी आवश्यक दस्तावेज और मेडिकल बिल बीमा कंपनी को प्रस्तुत किए गए, बावजूद इसके कंपनी ने दावा निरस्त कर दिया। आयोग ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि बीमा कंपनी द्वारा बार-बार अनावश्यक आपत्तियां उठाकर प्रकरण को वर्षों तक लंबित रखा गया। आयोग ने इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की मूल भावना के विपरीत बताते हुए कंपनी के रवैये को अनुचित और उपभोक्ता विरोधी करार दिया।जिला आयोग के अध्यक्ष मनोज कुमार मील एवं सदस्य प्रमेन्द्र कुमार सैनी की पीठ ने अपने आदेश में रिलायंस जनरल इंश्योरेंस को निर्देश दिए कि वह उपभोक्ता को 1,81,529 रुपये की दावा राशि, वाद दायर करने की तिथि से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करे। साथ ही मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक क्षतिपूर्ति के रूप में 15,500 रुपये तथा वाद व्यय के रूप में 10,500 रुपये का भुगतान भी करने को कहा गया है।आयोग ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समयावधि में आदेश की पालना नहीं की जाती है, तो देय राशि पर 12.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा। आयोग ने अपने फैसले में लिखा है कि प्रार्थी की ओर से परिवाद प्रस्तुत करने के साथ पत्रावली के रिकॉर्ड पर उपलब्ध करवाई गई चिकित्सकीय उपचार खर्चे से सम्बन्धित बिल की छायाप्रतियां जानकारी में आने के बावजूद भी अप्रार्थी बीमा कम्पनी ने राष्ट्रीय लोक अदालत के अनेक अवसर प्राप्त होने के बावजूद भी प्रकरण का निस्तारण करवाने में कोई रूचि नहीं दिखाई है। बल्कि प्रकरण में अनावश्यक रुप से एक ही प्रकार के प्रार्थना पत्र बार-बार प्रस्तुत कर प्रकरण को लम्बित रखने का प्रयास किया जाता रहा है और 11 वर्षों की देरी की। लोक अदालत में भी मामले के निस्तारण का प्रयास नहीं किया। यह निर्णय उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है और बीमा कंपनियों को स्पष्ट संदेश देता है कि दावों के निपटारे में बीमा धारक द्वारा दस्तावेज उपलब्ध नहीं करवाने का बहाना करके लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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