विप्र कल्याण बोर्ड नहीं बना तो बदलेगा सियासी गणित — महेश बसावतिया

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सरकार के दोहरे मापदंडों से खफा ब्राह्मण समाज, बसावतिया बोल सनातन की अनदेखी पड़ेगी महंगी, अन्य समाजों को बोर्ड, विप्र समाज को अपमान

झुंझुनूं I अजीत जांगिड़
राज्य सरकार द्वारा विप्र कल्याण बोर्ड के पुनर्गठन को लगातार टालने से अब मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सीधा राजनीतिक और चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है। विप्र सेना के प्रदेश वरिष्ठ उपाध्यक्ष महेश बसावतिया ने सरकार को साफ शब्दों में आगाह किया है कि यदि शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो इसका खामियाजा सत्ता पक्ष को चुनावी मैदान में भुगतना पड़ेगा। बसावतिया ने कहा कि सनातन संस्कृति की धुरी रहे ब्राह्मण समाज को हाशिये पर धकेलना सरकार की भारी भूल साबित होगी। उन्होंने चेताया कि जिस समाज ने सदियों तक भारतीय सभ्यता को दिशा दी, वही समाज आज स्वयं अपने अधिकारों के लिए संघर्ष को मजबूर है, और यह स्थिति सरकार की राजनीतिक समझ पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार चुनिंदा समाजों को खुश करने की नीति पर काम कर रही है। अन्य समाजों के कल्याण बोर्ड सक्रिय हैं, बजट है, योजनाएं हैं, लेकिन विप्र समाज के हिस्से केवल उपेक्षा और आश्वासन आए हैं। यह संतुलन नहीं, तुष्टिकरण की राजनीति है, जिसे विप्र समाज अब खुले तौर पर चुनौती देगा। कांग्रेस से लेकर वर्तमान सरकार तक सवालों के घेरे में – बसावतिया ने कहा कि पूर्व कांग्रेस सरकार ने विप्र कल्याण बोर्ड को जानबूझकर निष्क्रिय रखा, न अधिकार दिए गए, न संसाधन। उन्होंने चेताया कि यदि वर्तमान भाजपा सरकार भी वही रवैया अपनाती है, तो जनादेश की अनदेखी का संदेश जनता तक जाएगा, जिसका असर आने वाले चुनावों में साफ दिखेगा।

मुख्यमंत्री को अल्टीमेटम 

महेश बसावतिया ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से मांग की कि सरकार विप्र समाज को हल्के में लेने की भूल न करे।
तत्काल विप्र कल्याण बोर्ड का पुनर्गठन कर उसे अधिकार, बजट और स्पष्ट कार्ययोजना दी जाए। साथ ही इसकी कमान ऐसे सनातननिष्ठ विप्र नेतृत्व को सौंपी जाए, जो समाज की आवाज़ सत्ता के गलियारों तक मजबूती से पहुंचा सके।वोट की ताकत दिखाने का ऐलान – उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि विप्र समाज अब चुप नहीं बैठेगा।यदि सरकार ने समय रहते फैसला नहीं लिया, तो प्रदेशभर में चरणबद्ध आंदोलन, जनसंपर्क अभियान और चुनावी बहिष्कार जैसे विकल्पों पर विचार किया जाएगा।उन्होंने कहा कि यह आंदोलन सड़क से लेकर मतदान केंद्र तक असर दिखाएगा, और इसकी पूरी राजनीतिक जिम्मेदारी सरकार की होगी।

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